nazmKuch Alfaaz

तिरे दरख़्तों की टहनियों पर बहार उतरे तिरी गुज़रगाहें नेक राहों की मंज़िलें हों मिरा ज़माना नए नए मौसमों की ख़ुश्बू तिरे शब-ओ-रोज़ की महक हो ज़मीन पर जब भी रात फैले किरन जो ज़ुल्मत को रौशनी दे तिरी किरन हो परिंदे उड़ते हुए परिंदे हज़ार सम्तों से तेरे बाग़ों में चहचहाएँ वो रात जिस की सहर नहीं है वो तेरे शहरों से तेरे क़स्बों से दूर गुज़रे वो हाथ जो अज़्मतों के हिज्जे मिटा रहा है वो हाथ लौह-ओ-क़लम के शजरे से टूट जाए कलस पे लफ़्ज़ों के फूल बरसें तिरी फ़सीलों के बुर्ज दुनिया में जगमगाएँ अकेले-पन की सज़ा में दिन काटते हज़ारों तिरी ज़ियारत-गहों की बख़्शिश से ताज़ा-दम हों तिरे मुक़द्दर की बादशाहत ज़मीं पे निखरे नए ज़माने की इब्तिदा तेरे नाम से हो ख़ुशी के चेहरे पे वस्ल का अब्र तैर जाए तमाम दुनिया में तज़्किरे तेरे फैल जाएँ

Related Nazm

उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

475 likes

बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

54 likes

"मुझ सेे पहले" मुझ सेे पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा खो चुका है जो किसी और की रा'नाई में शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़ मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ

Ahmad Faraz

10 likes

"इंतिज़ार" एक उम्र गुज़ार चुके तो महसूस किया है जिसे उम्र भर चाहा वो मग़रूर हुआ है एक शख़्स का इंतिज़ार हर वक़्त किया है वो जा चुका है हमें अब यक़ीन हुआ है तिरे इंतिज़ार ने बालों को सफेद किया है हम समझते रहे ये धूल का किया है

ALI ZUHRI

11 likes

मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

19 likes

More from Jelani Kamran

कौन से बाग़ में जा कर हो आए दिल की हर बात सुना कर हो आए! एक साअत को जहाँ देखा कई चेहरे थे ख़ुश-नुमा बज़्म में हर एक तरफ़ फूल के अध-खिलते हुए सहरे थे इक अजब आब-ओ-हवा बिखरी थी जिस के चलने से सहर और बहुत निखरी थी मैं ने हर सम्त कहा मैं हूँ! ये तुम हो? तू है? ऐसे आलम में ये क्या ख़ुशबू है? इक अजब वक़्त रहा दीद का देखा पाया महफ़िल-ए-राह में जिस जिस को ज़मीं पर देखा उस को इस बाग़ में चलते पाया

Jelani Kamran

0 likes

कल रात वो आसमानों से उतरा बहुत ख़ुश हुआ बहुत ख़ुश हुआ जैसे गहरे समुंदर ग़ज़बनाकियों में उछलते हैं या आसमाँ पर फ़रिश्ते क़ुबूल-ए-इबादत पे मसरूर होते हैं उस ने कहा मैं ने जो कुछ कहा था वो पूरा हुआ जो मैं देखता था वो मैं देखता था जो वो देखता था वो शीशे में ख़ुद उस का अपना ही चेहरा था ज़ाहिर न मख़्फ़ी न वाज़ेह फ़क़त एक मुमकिन कि होता न होता उस ने ये देख कर अपनी हर कामयाबी की फ़िहरिस्त तरतीब दी और आख़िर में लिक्खा ज़मीन पर ख़ुदा की तवक़्क़ो न पूरी हुई थी न पूरी हुई है जिसे हम ने आदम कहा था वो मिट्टी का बे-कार बे-अस्ल धोका था धोका ही साबित हुआ उस से कुछ न हुआ फ़ज़ाओं में नीली हवाओं में दोज़ख़ में जन्नत में अक़्वाम-ए-आलम की महफ़िल-सराओं में उस बे-नवा का तमस्ख़ुर उड़ा जिसे मैं ने बर-वक़्त रोका था

Jelani Kamran

0 likes

दिन आया न मल्बूस बदल के न निखर के और लोग भी निकले न शगुफ़्ता न चमकदार तब मैं ने सोचा मिरे काग़ज़ के ग़ुब्बारे न नाचें तो बेहतर है इक उम्र का सदमा है बहुत तल्ख़ ज़मीं को न सालगिरह आज मनाऊँ मैं तो बेहतर वो भी नहीं ख़ुश और न ख़ुश दिन का गुज़र है ऐ उम्र तिरा सख़्त अकेले का सफ़र है तब मैं ने कहा चाँद अगर अपने बदन को औरत का बदन दे तो मैं काँटों के तराज़ू दिल दे के बदल लूँ दिल दे के बदल लूँ मैं क़यामत भी गहन भी और उन के एवज़ उस से कहूँ आज के दिन तो रुक मेरी ज़मीं पर तक़दीर हवा बन के दरख़्तों में खड़ी है और मैं ऐ अजब चीज़ चटानों पे गिरा हूँ

Jelani Kamran

0 likes

हमारे मकानों से ऊपर से कूजें जुनूबी इलाक़े से आती हुई चाँद तारा बनाती हुई आज गुज़रेंगी उन के गुज़रने मसाफ़त में रू-पोश होने से हम जान लेंगे कड़ाके की सर्दी गई है बहार आ रही है यूँँही गोद माँ की लड़कपन जवानी बुढ़ापा बहार आ रही है इन्ही रुख़ बदलते हुए राह जाते हुए क़ाफ़िलों को कोई मेरी जानिब से इतना कहे आने-जाने के फैले हुए क़ाफ़िले पर कहाँ सर्द मौसम रुकेगा कहाँ किस तरफ़ से बहार आएगी सब्ज़ा किन रास्तों पर उगेगा जवानी बुढ़ापा लड़कपन ज़मीं और माँ रफ़्त के बा'द आमद कहाँ है

Jelani Kamran

0 likes

मेरे हाथ पे लिक्खा क्या है उम्र के ऊपर बर्क़ का गहरा साया क्या है कौन ख़फ़ा है राह का बूढ़ा पेड़ झुका है चिड़ियाँ हैं चुप-चाप आती जाती रुत के बदले गर्द की गहरी छाप गर्द के पीछे आने वाले दौर की धीमी थाप रस्ता क्या है मंज़िल क्या है मेरे साथ सफ़र पर आते-जाते लोगों महशर क्या है माज़ी हाल का बदला बदला मंज़र क्या है मैं और तू क्या चीज़ हैं तिनके पत्ते एक निशान अक्स के अंदर टुकड़े टुकड़े ज़ाहिर में इंसान कब के ढूँड रहे हैं हम सब अपना नख़लिस्तान नाक़ा क्या है महमिल क्या है शहर से आते-जाते लोगों देखो राह से कौन गया है जलते काग़ज़ की ख़ुश्बू में ग़र्क़ फ़ज़ा है चारों सम्त से लोग बढ़े हैं ऊँचे शहर के पास आज अँधेरी रात में अपना कौन है राह-शनास ख़्वाब की हर ता'बीर में गुम है अच्छी शय की आस दिन क्या शय है साया क्या है घटते-बढ़ते चाँद के अंदर दुनिया क्या है फ़र्श पे गिर कर दिल का शीशा टूट गया है

Jelani Kamran

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Jelani Kamran.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Jelani Kamran's nazm.