"सिगरेट" जब भी कभी मैं ने तुम्हें सुलगाया तुम कभी भी अकेली नहीं सुलगी तुम्हारे साथ एक प्यारी सी लड़की भी अक्सर सुलग जाती थी उस लड़की का वो लहजा वो आँखें माथे की वो सिलवटें अक्सर मुझे बहुत कुछ कहती थी आज एक अरसे बा'द मैं ने फिर से सिगरेट सुलगाई है दुख की बात ये है कि आज सिगरेट के साथ सुलगने वाला कोई नहीं है
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"बेबसी" वो गीत जिन्हें तुम सुना करते थे वो लम्हें वो फिल्में वो सभी चीज़े अब अक्सर मुझे बहुत सताते है वो कमरा जिस में उस का मन लगता था अब सिर पर हाथ रख कर बैठा है एक अरसे से बस तुम्हारे इंतिज़ार में इन सब चीज़ों की हालत ठीक उसी बच्चे की तरह है जो किसी मेले में अपनी माँ से बिछड़ जाता है तुम सेे जुड़ी हुई हर चीज़ बे-रंग बेजान बेसहारा होकर एक ऐसी बेबस हालत में पड़ी है जिन्हें ना तो अब नींद आती ना ही मौत
Neeraj Saroha
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"दरख़्त और तुम" वो दरख़्त जो तुम ने लगाए थे अब वो बड़े हो गए है उन पर मीठे मीठे फल भी लगने लगे है बिल्कुल तुम्हारे लहजे की तरह इन दरख़्तों में अक्सर मैं ने तुम्हें पाया है जब जब तुम मुझ सेे मिलने आते थे तो हम ऐसे ही किसी दरख़्त की छाँव के नीचे बैठ जाया करते थे अब जब भी मैं इन दरख़्तों के पास आता हूँ तो मुझे यही महसूस होता है कि तुम मेरे साथ ही हो तुम्हारे जाने के बा'द भी इन दरख़्तों ने मुझे तुम्हारे पास ही रखा है इन दरख़्तों का एहसान मैं पूरी उम्र नहीं उतार सकता मैं अब यही चाहता हूँ कि इन दरख़्तों को मेरी भी उम्र लग जाए क्योंकि अगर मेरे बा'द कोई मेरे जैसा ही उदासी भरा इंसान इन्हें मिले तो ये सब मिल कर उस को सम्भाल सकें
Neeraj Saroha
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