एक ख़्वाब लाल बिंदी माथा चू में ख़ुशबू महकाए तन देख उन्हें ख़्वाबों में खिलता हो जैसे मन चाँद सी प्यारी सूरत झीलों सी गहरी आँखें शहद से हैं लब उन के मीठी सी उन की बातें ख़्वाब में मिल जाते हैं हम उन सेे कुछ ऐसे कि गुज़रता हैं न दिन न ही गुज़रा करती रातें पंख फैला उड़ती वो कौन तितली न जाने फूल हम भी बन जाते जब आती वो महकाने दूर से देखा करती हैं वो ज़ुल्फ़ों को लहराए क़त्ल करती हैं मानो कोई उन को समझाए है परी कोई या है वो कोई जादूगरनी दिल हमारा मंत्रित कर के वश में करती जाए ख़्वाब में मिल जाते हैं हम उन सेे कुछ ऐसे कि गुज़रता है न दिन न ही गुज़रा करती रातें
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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कर्म कब बारिश होगी बादल से कब अंबर से जल निकलेगा छिपकर बैठा है लपटों में वो सोना भी तो निखरेगा चाहे अंबर में गरजन हो राहों में कोई अर्चन हो हम तब तक नईं फिर हारेंगे जब तक इस दिल में धड़कन हो पर्वत को ऐसे तोड़ेंगे इक दिन तो रस्ता छोड़ेगा धरती को इतना खोदेंगे इक दिन उस में जल निकलेगा हर मुश्किल का हल निकलेगा हर मुश्किल का हल निकलेगा
Piyush Shrivastava
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"एक नदिया की मँझधार में" जैसे गहरी सी नदिया की मँझधार में ऐसे उलझा पड़ा हूँ मैं संसार में जो भी चाहे वो उतनी ही चाबी भरे जैसे कोई खिलौना हूँ बाज़ार में सब ने हम को यूँँ देखा अनदेखा किया ये तो होता नहीं है घर परिवार में बातें दिल में यूँँ कुछ मेरे चुभती रही लगती है कील इक जैसे दीवार में कोई सोचे भला कोई सोचे बुरा अंतर आने लगा सबके किरदार में जैसे गहरी सी नदिया की मँझधार में ऐसे उलझा पड़ा हूँ मैं संसार में
Piyush Shrivastava
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"एक झलक" उस की आँखों का दीदार हो गया फिर लड़का पूरा बेकार हो गया दिल में कुछ ऐसी हलचल होने लगी वीणा का वो कोई तार हो गया आँखों से नींदें उड़ने लगी कहीं ख़्वाबों का कोई बाज़ार हो गया कहता था ख़ुद को इक ट्रांसफ़ॉर्मर इक झटके में देखो तार हो गया इक लड़की जादू कर के चली गई लड़का तो पूरा बीमार हो गया
Piyush Shrivastava
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"दास्तान-ए-ज़िंदगी" तकलीफ बढ़ चली है उम्मीद घट चली है तकदीर सो चली है ये रात रो पड़ी है टूटे पड़े बेसेरे काले हुए सवेरे प्यासे रहे किनारे बुझने लगे सितारे वो ख़्वाब भी गया तब ये दौर है नया अब कोई चराग़ चमके कोई किताब पलटे ख़ाली रही किताबें सूनी पड़ी न जाने ग़म भी झलक रहा है शीशा चटक रहा है टूटा मिला महल भी जो ख़्वाब में चमक रहा है वो ख़्वाब भी गया तब ये दौर है नया अब
Piyush Shrivastava
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