nazmKuch Alfaaz

ज़िंदा-बाश ऐ इंक़लाब ऐ शोला-ए-फ़ानूस-ए-हिन्द गर्मियाँ जिस की फ़रोग़-ए-मंक़ल-ए-जाँ हो गईं बस्तियों पर छा रही थीं मौत की ख़ामोशियाँ तू ने सूर अपना जो फूँका महशरिस्ताँ हो गईं जितनी बूँदें थीं शहीदान-ए-वतन के ख़ून की क़स्र-आज़ादी की आराइश का सामाँ हो गईं मर्हबा ऐ नौ-गिरफ़्तारान-ए-बेदाद-ए-फ़रंग जिन की ज़ंजीरें ख़रोश-अफ़ज़ा-ए-ज़िंदाँ हो गईं ज़िंदगी उन की है दीन उन का है दुनिया उन की है जिन की जानें क़ौम की इज़्ज़त पे क़ुर्बां हो गईं

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"एक बात'" क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को उन सब बातों को जो दबी रहती हैं तुम्हारी पलकों की क़तारों में तब भी, जब लब ख़ामोश होते हैं तुम्हारे या तब, जब बस यूँँ ही मुस्कुरा देती हो मुझ सेे बात करते-करते और तब, जब होंठ तुम्हारे कुछ और ही कहते हैं और कहते कहते रुक जाया करते हैं एक बात नहीं बताई तुम्हें के तब मैं चुपके से पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को पूछ लेता हूँ हाल तुम्हारा कहता कुछ नहीं हाँ, आँखें बात करती हैं मेरी भी हज़ारों सवालात भी तुम्हारी ही तरह फिर क्यूँँ जवाब नहीं दे पातीं तुम्हारी आँखें क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को कि तुम भी पढ़ लो वो बातें जिन में होंठ ख़ामोश रहते हैं और वो सारी बातें जो अब तक नहीं कही तुम सेे या मुझे भी सिखा दो अपना आँखों से झूठ बोलने का हुनर

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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प्रयाग में मिली है जमुना से आ के गंगा पिघला हुआ ये नीलम बहता हुआ वो हीरा इन की जुदाइयों ने खींचा है नक़्श-ए-जौज़ा इन की रवानियाँ हैं शान-ए-ख़ुदा-एयकता संगम की सीढ़ियों पर मोती लुढ़क रहा है

Zafar Ali Khan

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ऐ नुक्ता-वरान-ए-सुख़न-आरा-ओ-सुख़न-संज ऐ नग़्मा-गिरान-ए-चमनिस्तान-ए-मआफ़ी माना कि दिल-अफ़रोज़ है अफ़्साना-ए-अज़रा माना कि दिल-आवेज़ है सलमा की कहानी माना कि अगर छेड़ हसीनों से चली जाए कट जाएगा इस मश्ग़ले में अहद-ए-जवानी गरमाएगा ये हमहमा अफ़्सुर्दा दिलों को बढ़ जाएगी दरिया-ए-तबीअत की रवानी माना कि हैं आप अपने ज़माने के 'नज़ीरी' माना कि हर इक आप में है उर्फ़ी-ए-सानी माना की हदीस-ए-ख़त-ओ-रुख़्सार के आगे बेकार है मश्शाइयों की फ़ल्सफ़ा-दानी माना कि यही ज़ुल्फ़ ओ ख़त-ओ-ख़ाल की रूदाद है माया-ए-गुल-कारी-ए-ऐवान-ए-मआफ़ी लेकिन कभी इस बात को भी आप ने सोचा ये आप की तक़्वीम है सदियों की पुरानी माशूक़ नए बज़्म नई रंग नया है पैदा नए ख़ा में हुए हैं और नए 'मानी' मिज़्गाँ की सिनाँ के एवज़ अब सुनती है महफ़िल काँटों की कथा बरहना-पाई की ज़बानी लज़्ज़त वो कहाँ लाल-ए-लब-ए-यार में है आज जो दे रही है पेट के भूखों की कहानी बदला है ज़माना तो बदलिए रविश अपनी जो क़ौम है बेदार ये है उस की निशानी ऐ हम-नफ़सो याद रहे ख़ूब ये तुम को बस्ती नई मशरिक़ में हमीं को है बसानी

Zafar Ali Khan

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बारहा देखा है तू ने आसमाँ का इंक़लाब खोल आँख और देख अब हिन्दोस्ताँ का इंक़लाब मग़रिब ओ मशरिक़ नज़र आने लगे ज़ेर-ओ-ज़बर इंक़लाब-ए-हिन्द है सारे जहाँ का इंक़लाब कर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवार फ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाब सब्र वाले छा रहे हैं जब्र की अक़्लीम पर हो गया फ़र्सूदा शमशीर-ओ-सिनाँ का इंक़लाब

Zafar Ali Khan

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अश्नान करने घर से चले लाला-लाल-चंद और आगे आगे लाला के उन की बहू गई पूछा जो मैं ने लाला लल्लाइन कहाँ गईं नीची नज़र से कहने लगे वो भी चू गई मैं ने दिया जवाब उन्हें अज़-रह-ए-मज़ाक़ क्या वो भी कोई छत थी कि बारिश से चू गई कहने लगे कि आप भी हैं मस्ख़रे अजब अब तक भी आप से न तमस्ख़ुर की ख़ू गई चू होशियार पर मैं नदी से है ये मुराद बीबी तमीज़ भी हैं वहीं करने वुज़ू गई मैं ने कहा कि चू से अगर है मुराद जू फिर यूँँ कहो कि ता-ब-लब-ए-आब-जू गई क्यूँँ ऐंठें हैं माश के आटे की तरह आप धोती से आप की नहीं हल्दी की बू गई लुत्फ़-ए-ज़बाँ से क्या हो सरोकार आप को दामन को आप के नहीं तहज़ीब छू गई हिन्दी ने आ के जीम कूचे से बदल दिया चू आई कोहसार से गुलशन से जू गई लहजा हुआ दुरुश्त ज़बाँ हो गई करख़्त लुत्फ़-ए-कलाम-ओ-शिस्तगी-ए-गुफ़्तुगू गई मा'नी को है गिला कि हुआ बे-हिजाब मैं शिकवा है लफ़्ज़ को कि मिरी आबरू गई अफ़्सोस मुल्क में न रही फ़ारसी की क़द्र मस्ती उड़ी शराब से फूलों की बू गई

Zafar Ali Khan

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है कल की अभी बात कि थे हिन्द के सरताज देते थे तुम्हें आ के सलातीन-ए-ज़मन बाज क्या रंग ज़माने ने ये बदला है कि तुम को दुनिया की हर इक क़ौम समझती है ज़लील आज दामान-ए-निगह जिस की फ़ज़ा के लिए था तंग वो बाग़ हुआ देखते ही देखते ताराज जब तक रहे तुम दस्त-निगर अपने ख़ुदा के होने न दिया उस ने तुम्हें ग़ैर का मुहताज जो हो गए उस के वो हुआ उन का निगहबाँ उस की है जिन्हें शर्म है उन की भी उसे लाज मिट जाओ मगर हक़ को न मिटते हुए देखो सीखो ये रविश गर तुम्हें लेना है स्वराज

Zafar Ali Khan

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