ग़लत-फ़हमी भले दिनों की बात है भला सा एक शहर था ग़मों के उस दयार में फ़लक से उतरी अप्सरा थी शक्ल से बहार वो गुलाब जैसे गाल थे थी चाल उस की नदियों सी कि रेशमी से बाल थे अदब था उस में इस-क़दर कि शर्म भी हया करे वो आए सज के सामने तो चाँद भी गिला करे वो जिस दिशा भी चल पड़े हज़ार भॅंवरे हम-सफ़र कि हर रक़ीब लड़ पड़े वो देख ले पलट के गर ग़मों के उस दयार से ग़मों ने फिर विदा लिया कि दिल-कशी सी छा गई यूँँ इश्क़ ने असर किया ये उन दिनों की बात है मैं बे-ख़बर था इश्क़ से वो दोस्तों की दास्ताँ मज़ाक़ थी मेरे लिए मगर मेरे नसीब में थीं बद-दुआएँ इश्क़ की सो एक रोज़ यूँँ हुआ कि रू-ब-रू वो मिल गई भली सी इक वो शाम थी गुज़र रहा था मोड़ से न जाने क्या सितम हुआ कि आ गई वो सामने नज़र से यूँँ नज़र लड़ी कि वक़्त जैसे खो गया मैं क्या बताऊँ हाल-ए-दिल कि इल्म-ए-इश्क़ हो गया गली में उस की रात-दिन यही बस एक काम था कि उस के आशिक़ों में फिर मेरा भी एक नाम था पलट के उस को देखूँ मैं तो खुल के मुस्कुराए वो मैं भाने लग गया उसे मुझे भी रास आए वो ख़ुदा ने यूँँ ग़ज़ब किया कि बात होने लग गई मैं शे'र कहने लग गया वो ख़्वाब बोने लग गई मगर हुआ ये इल्म फिर कि हम थे इख़्तिलाफ़ में मैं इश्क़ के ख़ुमार में वो इश्क़ के ख़िलाफ़ में थी उस को चश्म-ए-दोस्ती मैं इश्क़ का नशा लिए तो कोशिशें शुरू हुईं कि रिश्ता ये बचा रहे मगर है सच ये बात भी कि कब तलक फ़िज़ूल में यूँँ इश्क़ के दरख़्त पे ये दोस्ती के गुल खिलें सो एक रोज़ क्या हुआ कि बात इस-क़दर हुई मैं इश्क़ पे अड़ा रहा कि दोस्ती बिखर गई मैं इश्क़ का दलाल था वो दोस्ती को रब कहे हर इक मेरी दलील को वो जिस्म की तलब कहे ये इश्क़-विश्क़ जाल है कि मुझ को इनसे बख़्श दो अगर क़ुबूल हो तुम्हें तो दोस्ती के ख़त लिखो है इश्क़ की तलब तुम्हें मैं हूँ अलग मिज़ाज की न शौक़ कुछ तबाही का मैं लड़की काम-काज की मैं दोस्ती निभाऊँगी ख़ुदा की है क़सम मुझे मगर जो ज़िद हो इश्क़ की तो भूल जाओ तुम मुझे न उस के दिल में इश्क़ था न मेरे दिल में दोस्ती मैं मोड़ पर खड़ा रहा वो छोड़ कर चली गई थी आँख नम अगर मेरी उसे भी कुछ मलाल था मिलेंगे फिर कभी न हम ये उस को भी ख़याल था सो यूँँ हुआ कि फिर हमें नसीब ने जुदा किया वो दोस्त के बिना रही मैं इश्क़ के बिना जिया वो क्या ख़बर कहाँ गई कि कुछ पता नहीं चला मैं उस की याद में मगर हज़ार शब जगा रहा मैं अपने ग़म की दास्ताँ सुनाता ही चला गया सुख़न थे जो फ़िराक़ के वो गाता ही चला गया ये आजकल की बात है हज़ार ग़म हैं सहने को क़लम अगर उठाऊँ तो न कुछ बचा है कहने को न क़ाफ़िए बचे हैं कुछ न कुछ रदीफ़ें रह गईं थीं ग़ज़लें जो भी पास में वो आँसुओं में बह गईं है बहर की समझ कहाँ जो नज़्म कोई कह सकूँ है शा'इरी कि बेबसी मैं क्या कहूँ मैं क्या लिखूँ सो अब कुछ ऐसा हाल है कि कोई चारा-गर नहीं भला हूँ या बुरा हूँ मैं किसी को कुछ ख़बर नहीं न अब किसी से इश्क़ है न है किसी से दोस्ती है उस की शक्ल ज़ेहन में पता नहीं कभी-कभी
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है ये सुब्ह सुब्ह की बात है
Gorakh Pandey
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"अफ़सोस-2" मोहब्बत में तुम्हें जब उम्र भर का साथ चुभता है अगर ये इश्क़ भी मेरा महज़ इक झूठ लगता है तुम अपनी शाइरी को भी मेरी ग़लती बताते हो तो फिर बोलो कि मुझ से तुम मोहब्बत क्यूँ जताते हो कहो किस हक़ से अब मुझ से कोई भी चाह है तुमको बताओ क्यूँ मेरी ख़ुशियों की यूँ परवाह है तुम को चलो छोड़ो कहा तुम ने जो सब कुछ मानती हूँ मैं मेरा जो हाल होना है ब-ख़ूबी जानती हूँ मैं मुबारक हो तुम्हारी याद में मैं रोज़ जलती हूँ मोहब्बत वाकई अफ़सोस है अब मैं समझती हूँ
Rehaan
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"बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है" बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं कम हो रही हर एक मील की दूरी पे अपने दिल की धड़कनें बढ़ा रहा हूँ मैं दिन गुज़रा है आज फिर वैसा ही थकान भरा पर ख़ुद को अभी बहुत अम्लान पा रहा हँ मैं छाया है आकाश में अँधेरा घना अमावस का ख़यालों में तेरे रूप-सा चाँद बसा रहा हूँ मैं मानकर साक्षी पीछे छूटते हर एक गाँव को अतीत की सभी रंजिशों से कसक मिटा रहा हूँ मैं रात कुछ कट चुकी है कुछ ढलनी अब भी बाक़ी है सवेरा जल्द होने की उम्मीद लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं बढ़ रही हर एक मील की दूरी पे तेरे किए वो सभी वाइदे भुला रहा हूँ मैं रात तेरे ख़्वाबों से नींद मुकम्मल शादाब हुई जाने फिर क्यूँँ ख़ुद को इतना क्लान्त पा रहा हूँ मैं मालूम है चाँद को अब मोहब्बत नहीं चकोर से फिर भी बादलों को ही दोषी ठहरा रहा हूँ मैं कोशिशों में कोई कमी शायद मुझ सेे ही रह गई होगी तुझ सेे नाराज़ इस दिल को हर बार यही समझा रहा हूँ मैं चुभने लगे हैं अब ये फ़ुज़ूल के उजाले आँखों में अँधेरा जल्द होने की अरदास लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं
Rehaan
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'ऐसा क्यूँँ होता है' ऐसा क्यूँँ होता है जाता है कोई तो लौट के फिर न वो आता दुबारा ऐसा क्यूँँ होता है चंदा के जाने से लगता फ़लक ये सूना सारा दुनिया ये प्यार की दुश्मन इस सेे न पार पाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है मौला अपनों से हार जाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है दिल जो बिछड़ते हैं दिन न गुज़रते हैं शा में न कटती हैं रातें न छटती हैं लगता नहीं कहीं दिल ये बेचारा ऐसा क्यूँँ होता है रहती हैं आँखें नम हो नहीं पाता है गुज़ारा वादे किए थे उस ने जो वादे थे उस के सारे झूठे जितना उसे था कल चाहा ख़ुद से हैं आज उतने रूठे ऐसा क्यूँँ होता है भूलना चाहूँ तो दिल को मनाऊँ तो दिल न समझता है मुझ सेे उलझता है करता है उस पे ही बस ये इशारा ऐसा क्यूँँ होता है जब भी यूँँ होता है दिल ये हो जाता बे-सहारा
Rehaan
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'सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ' अच्छा! तुम्हें एक ख़बर सुना रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ पूरे नौ दिनों की छुट्टियाँ मिली हैं मगर छुट्टियाँ तो महज़ एक बहाना है अस्ल में तो तुम सेे मिलना चाहता हूँ तुम्हें रू-ब-रू देखना चाहता हूँ इक दफ़ा फिर बाहों में भरना चाहता हूँ अस्ल में मैं थोड़ा-सा थक गया हूँ तुम्हारी गोद में कुछ देर सोना चाहता हूँ सफ़र की धूप में बहुत जल चुका हूँ ज़रा ज़ुल्फ़ों की पनाह में रहना चाहता हूँ अंजान राहों पे बड़ा भटक लिया हूँ तुम्हारे दिल के मकाँ में ठहरना चाहता हूँ बस नौ ही दिन मिले हैं मुझे मरियम हर पल तुम्हारे साथ गुज़ारना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि मेरा इंतिज़ार करना ठीक वैसे ही उन हसीन शामों की तरह उसी सफ़ेद सलवार और कुर्ती में सँवरना और गले में लहराता वही सुर्ख़ दुपट्टा अपनी छत की मुंडेर पर तुम खड़ी रहना गुज़रुँगा जब मैं गली से तुम्हारी तो रोकना न ख़ुद को तुम मुस्कुराने से मगर इस बार फेर लूँगा नज़रें मैं तुम सेे तुम भी रोक लेना ख़ुद को क़दम बढ़ाने से है क़सम हम दोनों को उस रिश्ते की जिस का वजूद कोई नाम कोई हैसियत नहीं मैं ने ख़त में ऊपर लिक्खा है जो कुछ भी उन बातों की मरियम अब कोई अहमियत नहीं सोचो! फिर तुम्हें वो बातें क्यूँँ बता रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ
Rehaan
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'तुम पूछते हो कि वो क्या है' तुम पूछते हो कि वो क्या है क्यूँँ उस पर दिल मेरा यूँँ फ़िदा है मैं करता हूँ बस बातें उसी की जाने मुझे ये हो क्या गया है मेरी ग़ज़ल-शायरी में बस नाम उसी का वो राधा और मैं बस श्याम उसी का लगे है जग झूठा बस वो ही एक सच्ची सूरत कि जैसे कोई मासूम-सी बच्ची वो हँसे तो होंठों से फूल झरे निगाहें बस उसी को ढूँढा करें वो देखे तो लगतें हसीं लम्हात हैं सँवारे जब ज़ुल्फ़ें तो क्या बात है वो जान है मेरी वो मेरी महरम है ता'रीफ़ें जितनी भी करूँँ उस की कम हैं वो सितारों का आसमाँ वो बहारों का गुलिस्ताँ वो पूनम की चाँदनी कोई दिलकश-सी रागिनी वो जाड़े की धूप वो अप्सरा का स्वरूप वो ग़ालिब की ग़ज़ल वो राधा-सी सरल वो सरस्वती की वीणा और मीरा का एकतारा वो गंगा-सी पावन और यमुना की धारा वो परियों की रानी वो संगम का पानी वो तुलसी-सी पवित्र उस का सीता-सा चरित्र वो मुरली की तान वो वेदों का ज्ञान वो फूलों-सी कोमल है चंदन-सी शीतल वो मथुरा की सुब्ह और अवध की शाम वो बनारस की गलियाँ और वो ही चारों धाम है ख़ूब-सूरत वो उस में हया भी है वो दवा भी है वो दुआ भी है हैं रातें उसी से उसी से सवेरा वो रूठे तो छा जाए जग में अँधेरा वो बोले तो फ़िज़ाएँ बहना छोड़ दें शाइ'र भी शा'इरी कहना छोड़ दें वो चाहे तो चाँद को ज़मीं पे बुला दे घटाओं से कहीं भी बारिश करा दे वो मुस्कुराए तो मौसम ख़ुश-नुमा हो जाए हर मुसाफ़िर उस का रहनुमा हो जाए वो जैसे कि फ़रवरी का महीना है है काशी वो वो ही मदीना है वो छठ भी है वो रमज़ान भी है वो गीता भी है वो क़ुरान भी है वो लड़की नहीं वो मेरी ख़ुदा है और तुम पूछते हो कि वो क्या है
Rehaan
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