nazmKuch Alfaaz

"अफ़सोस-2" मोहब्बत में तुम्हें जब उम्र भर का साथ चुभता है अगर ये इश्क़ भी मेरा महज़ इक झूठ लगता है तुम अपनी शाइरी को भी मेरी ग़लती बताते हो तो फिर बोलो कि मुझ से तुम मोहब्बत क्यूँ जताते हो कहो किस हक़ से अब मुझ से कोई भी चाह है तुमको बताओ क्यूँ मेरी ख़ुशियों की यूँ परवाह है तुम को चलो छोड़ो कहा तुम ने जो सब कुछ मानती हूँ मैं मेरा जो हाल होना है ब-ख़ूबी जानती हूँ मैं मुबारक हो तुम्हारी याद में मैं रोज़ जलती हूँ मोहब्बत वाकई अफ़सोस है अब मैं समझती हूँ

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है" बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं कम हो रही हर एक मील की दूरी पे अपने दिल की धड़कनें बढ़ा रहा हूँ मैं दिन गुज़रा है आज फिर वैसा ही थकान भरा पर ख़ुद को अभी बहुत अम्लान पा रहा हँ मैं छाया है आकाश में अँधेरा घना अमावस का ख़यालों में तेरे रूप-सा चाँद बसा रहा हूँ मैं मानकर साक्षी पीछे छूटते हर एक गाँव को अतीत की सभी रंजिशों से कसक मिटा रहा हूँ मैं रात कुछ कट चुकी है कुछ ढलनी अब भी बाक़ी है सवेरा जल्द होने की उम्मीद लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं बढ़ रही हर एक मील की दूरी पे तेरे किए वो सभी वाइदे भुला रहा हूँ मैं रात तेरे ख़्वाबों से नींद मुकम्मल शादाब हुई जाने फिर क्यूँँ ख़ुद को इतना क्लान्त पा रहा हूँ मैं मालूम है चाँद को अब मोहब्बत नहीं चकोर से फिर भी बादलों को ही दोषी ठहरा रहा हूँ मैं कोशिशों में कोई कमी शायद मुझ सेे ही रह गई होगी तुझ सेे नाराज़ इस दिल को हर बार यही समझा रहा हूँ मैं चुभने लगे हैं अब ये फ़ुज़ूल के उजाले आँखों में अँधेरा जल्द होने की अरदास लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं

Rehaan

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'ऐसा क्यूँँ होता है' ऐसा क्यूँँ होता है जाता है कोई तो लौट के फिर न वो आता दुबारा ऐसा क्यूँँ होता है चंदा के जाने से लगता फ़लक ये सूना सारा दुनिया ये प्यार की दुश्मन इस सेे न पार पाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है मौला अपनों से हार जाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है दिल जो बिछड़ते हैं दिन न गुज़रते हैं शा में न कटती हैं रातें न छटती हैं लगता नहीं कहीं दिल ये बेचारा ऐसा क्यूँँ होता है रहती हैं आँखें नम हो नहीं पाता है गुज़ारा वादे किए थे उस ने जो वादे थे उस के सारे झूठे जितना उसे था कल चाहा ख़ुद से हैं आज उतने रूठे ऐसा क्यूँँ होता है भूलना चाहूँ तो दिल को मनाऊँ तो दिल न समझता है मुझ सेे उलझता है करता है उस पे ही बस ये इशारा ऐसा क्यूँँ होता है जब भी यूँँ होता है दिल ये हो जाता बे-सहारा

Rehaan

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दो जानिब एक मैं हूँ एक तू है दोनों बड़े नादान हैं तू मुझ सेे और मैं ख़ुद से दोनों ही अंजान हैं तेरी गलियाँ स्वर्ग हैं जैसे मेरा शहर शमशान है मैं शम्अ' कब से बुझा हुआ तुझ पर पतंगें क़ुर्बान हैं ख़ुशियाँ तेरे क़दम चूमतीं ग़म मेरे मेहमान हैं तुझ पर ख़ुदा फ़िदा है मुझ सेे घरवाले तक परेशान हैं मुझे कि बस इक ख़्वाहिश तेरी तुझे कि सैकड़ों अरमान हैं मेरी क़िस्मत में तू ही नहीं तुझ पर क़िस्मत मेहरबान है मैं तेरे लिए कुछ भी नहीं तू मेरे लिए भगवान है तेरे दिल में भले रेहान न हो तेरी ज़िन्दगी फिर भी रेहान है

Rehaan

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'सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ' अच्छा! तुम्हें एक ख़बर सुना रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ पूरे नौ दिनों की छुट्टियाँ मिली हैं मगर छुट्टियाँ तो महज़ एक बहाना है अस्ल में तो तुम सेे मिलना चाहता हूँ तुम्हें रू-ब-रू देखना चाहता हूँ इक दफ़ा फिर बाहों में भरना चाहता हूँ अस्ल में मैं थोड़ा-सा थक गया हूँ तुम्हारी गोद में कुछ देर सोना चाहता हूँ सफ़र की धूप में बहुत जल चुका हूँ ज़रा ज़ुल्फ़ों की पनाह में रहना चाहता हूँ अंजान राहों पे बड़ा भटक लिया हूँ तुम्हारे दिल के मकाँ में ठहरना चाहता हूँ बस नौ ही दिन मिले हैं मुझे मरियम हर पल तुम्हारे साथ गुज़ारना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि मेरा इंतिज़ार करना ठीक वैसे ही उन हसीन शामों की तरह उसी सफ़ेद सलवार और कुर्ती में सँवरना और गले में लहराता वही सुर्ख़ दुपट्टा अपनी छत की मुंडेर पर तुम खड़ी रहना गुज़रुँगा जब मैं गली से तुम्हारी तो रोकना न ख़ुद को तुम मुस्कुराने से मगर इस बार फेर लूँगा नज़रें मैं तुम सेे तुम भी रोक लेना ख़ुद को क़दम बढ़ाने से है क़सम हम दोनों को उस रिश्ते की जिस का वजूद कोई नाम कोई हैसियत नहीं मैं ने ख़त में ऊपर लिक्खा है जो कुछ भी उन बातों की मरियम अब कोई अहमियत नहीं सोचो! फिर तुम्हें वो बातें क्यूँँ बता रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ

Rehaan

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“ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो” ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो स्वजन हो साथी हो बोलो आख़िर तुम कौन हो अगर हो आशिक़ मेरी तो फिर तुम अबतक क्यूँँ मौन हो निश्चित ही तुम मोहब्बत के इज़हार से डरती हो जब कहने में इतनी दिक़्क़त है तो प्यार क्यूँँ करती हो कहीं डरती तुम उस न से तो नहीं जो बयान-ए-इश्क़ पे सुनना पड़े मोहब्बत भी पूरी न हो और नया साथी भी ढूँढ़ना पड़े पर ये भी तो सच है ना मोहब्बत में दोस्ती सराब है इक बार मोहब्बत हो जाए तो बस दोस्त रह पाना ख़्वाब है ख़ैर छोड़ो ये फ़िज़ूल की बातें चलो बस इतना ही बता दो क्यूँँ कर बैठी मोहब्बत मुझ सेे इस राज़ से तो पर्दा हटा दो सीधा दिल ही लगा बैठी मुझ में ऐसा भी क्या देख लिया तुम ने जो ख़ूबियाँ तुम ने देखी हैं काश! कभी तो देखा होता उस ने अब पढ़ ही लिया है आँखों को मेरी तो क्यूँँ न मुझ पर एक एहसान कर दो जिस नज़रिए से तुम ने देखा है मुझे वो सलीक़ा उस को दान कर दो वो पढ़ सके दिल को मेरे ये अज़ीज़ हुनर तुम उसे भी सीखा दो इस फ़रेब-ए-दुनिया के अँधेरे में एक रौशनी मोहब्बत की तुम उसे दिखा दो माना कि मैं लड़का हूँ पर ज़िन्दगी मेरी भी आसान नहीं कभी देखो ग़ौर से चेहरे को मेरे इस पे पहले-सी वो मुस्कान नहीं अब तुम ही कोई चमत्कार दिखा दो इस राँझे की मुस्कान लौटा दो ढूँढ़ कर तुम पता कहीं से मेरी हीर को मेरा हाल बता दो वो मिल जाए तुम्हें तो अच्छा है न मिले तब भी कोई गिला नहीं तुम लौट जाना घर को अपने सोचना मैं तुम सेे कभी मिला नहीं समझकर इक फ़िज़ूल ख़्वाब तुम इस अनचाह क़िस्से को भुला देना घोंटकर गला जज़्बात का अपने अरमानों को तुम सुला देना बड़ी मुश्किल से सॅंभाला है ख़ुद को मुझे दोबारा तोड़ने न आना कहीं और दिल लगा लेना तुम मुझ सेे रिश्ता जोड़ने न आना जिस मिलन की तुम को हसरत है वो मिलन कदाचित सम्भव नहीं दिल लगाने को बेचैन हो तुम तुम्हें दिल टूटने का अनुभव नहीं ये दोबारा दिल लगाने का हुनर मुझे रास नहीं आता टूटे दिल को मोहब्बत का अब कोई एहसास नहीं भाता कैसे हाँ कह दूँ मैं तुम को जब दिल में मेरे कोई आहट नहीं बस तुम्हारी ख़ुशी को ख़ुदा मान लूँ क्या मेरी अपनी कोई चाहत नहीं मोहब्बत से मैं समझौता कर लूँ नहीं मुझ को ये मंज़ूर कभी बस दिल बहलाने को दिल लगा लूँ नहीं इतना मैं मजबूर अभी माना कि हूँ थोड़ा टूटा मगर किसी हमदर्दी की चाहत नहीं तुम्हारा होना भी एक डर है इस मौजूदगी से मुझे कोई राहत नहीं बस भी करो यूँँ याद करना मुझे ये मुसलसल हिचकियाँ अब सही नहीं जातीं बे-दर्द ये बे-रुख़ी बातें बार-बार मुझ सेे अब कही नहीं जातीं न जाने क्यूँँ मेरी ख़ातिर तुम अपनों से फ़साद करती हो मुझ काफ़िर के इश्क़ में ख़ुद को क्यूँँ नाशाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो

Rehaan

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