ख़त मैं रात था वो के जिस में तुम ने छुपाए थे सारे अश्क अपने तुम्हारे आँगन की वो सुब्ह था के जिस में तुम मुस्कुरा रही थी मैं साज़ था वो पनाह जिस की तुम्हारे हाथों की नर्मियाँ थीं मैं गीत था वो के जिस को इतनी ख़ुशी से तुम गुनगुना रही थी मैं साथ था हर क़दम तुम्हारे मैं अक्स जैसे के बन गया था मगर जो अब हम बिछड़ चुके हैं तो ख़ुद को तुम अब सँभाल लेना अगर कभी मैं जो याद आऊँ तो मेरा ख़त तुम निकाल लेना उसे जो पढ़ना तो फिर ख़ुशी से उसे हवा में उछाल देना वो सारी बातें जो मैं ने उस में लिखी हैं जाना वो जी उठेंगी हिना सी ख़ुशबू महक उठेगी, फ़ज़ा में बाद-ए-सबा चलेगी तुम्हारे लब मुस्कुरा उठेंगे, तुम्हारी आँखों में अश्क होंगे तुम्हारी यादों के मोड़ पर मैं खड़ा मिलूँगा तुम्हें उसी पल हमारी क़ुर्बत के सारे लम्हे हमारी मजबूरियों का आलम वो सारी बातें जो हम पे गुज़रीं वो ख़त में मेरे लिखी हुई हैं तुम्हारी मख़मूर सी वो आँखें तुम्हारी ख़ुशबू तुम्हारी यादें अभी भी जैसे ग़ुलाब बन कर मेरी ग़ज़ल में खिली हुई हैं
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"गुफ़्त-ओ-गू" मेरे वतन तू प्यारे मिरे मुल्क-ए-मोतबर हालत पे आज अपनी ज़रा डाल इक नज़र क्या मिल सका है उन के लहू का सिला उन्हे तेरे लिए कफ़न में जो लौटे थे अपने घर अज़्मत को अपनी भूल रहा है तू ऐ वतन मेरे लबों से सुन ले ये किस्सा-ए-मुख़्तसर चाहे हो फ़लसफ़ा या रियाज़ी की बात हो तू ने ही तो जहाँ को सिखाए थे ये हुनर शतरंज किस की देन है दुनिया को कौन था तू ही तो था जहान की इक शम-ए-रहगुज़र क्यूँ भूलता है अपनी तू अज़्मत की दास्ताँ मेरे लबों से सुन ले ये किस्सा-ए-मुख़्तसर जब गुम हुआ वजूद सियह रात में तिरा कुर्बाँ हुए थे चाँद कई तब हुई सहर सींची गई लहू से ज़मीं गुल्सिताँ की जब तब जा के गुल खिले थे कई रंग के इधर बोया गया था जो कभी इन्सानियत का बीज क़ायम है उस के दम से ज़माने में इक शजर आज़ाद हो गए हैं सभी जिस्म क़ैद से क्यूँ सोच सब की आज भी है क़ैद में मगर हम भी शजर थे एक इसी गुल्सिताँ के और कुर्बान हम ने कर दिए तुझ पे सभी समर इल्ज़ाम फिर भी है कि वफ़ादार हम नहीं मज़हब के हैं वतन के अलम-दार हम नहीं मिट्टी से तेरी हम को है उल्फ़त कुछ इस क़दर सजदा ख़ुदा का करते हैं इस पर लगा के सर मज़हब है अव्वलीन तो मज़हब की बात सुन मज़हब ये कह रहा है वफ़ाएँ वतन से कर मेरे वतन अमीन मिरे मेरे हम-नज़र नज़रों में मेरी अब भी है तू एक ताजवर तुझ से लिया है हम ने ये पैमान ऐ वतन कुर्बाँ हमारी तुझ पे है मुस्कान ऐ वतन कुर्बाँ हमारे तुझ पे दिल-ओ-जान ऐ वतन कुर्बाँ हैं आज कल भी हैं कुर्बान ऐ वतन कुर्बाँ हमारे तुझ पे सब अरमान ऐ वतन है आन-बान शान भी कुर्बान ऐ वतन
Haider Khan
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आइना मैं किसी का आइना हूँ और ऐसा आइना हूँ जब कभी मुझ में वो ख़ुद को देखता है सोचता है क्या हसीं सच में है इतना वो या उस को मैं हसीं दिखला रहा हूँ बन-सँवर कर फिर वो चलता है लटें खोले हुए और देखता है बारहा ख़ुद को पलट कर और फिर वो सोचता है क्या मैं सच्चा हूँ या झूठा हूँ मगर फिर दिल ही दिल में वो ख़ुशी से मुस्कुरा कर सोचता है आइना सच बोलता है हाँ मगर जब भी कभी मैं उस को उस की ख़ामियों से रू-ब-रू करवाऊँ तब वो घूरता है इस क़दर मुझ को के जैसे जुर्म कोई कर दिया हो उस की आँखों से छलकता है ग़ज़ब ऐसा के जैसे घूर कर ही तोड़ देगा वो मुझे और छोड़ देगा ज़र्रा ज़र्रा इस ज़मीं पर और फिर धीरे से उठ कर वो चला जाता है मेरे सामने से फिर पलट कर भी नहीं मुझ को कभी वो देखता है और दिल ही दिल में ख़ुद से बोलता है इस जहाँ में कोई भी सच्चा नहीं अपना नहीं आइना झूठा है इस की बात में आना नहीं।
Haider Khan
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तुम यूँँ कभी लगता है मानो तुम हो उन पत्तों के जैसी जो के पतझड़ में भी शाखों पर खिले रहते हैं हर दम जो हवाओं के तरानों पर हमेशा झूमते हैं ज़िंदगी भर आह-ओ-नाला दर्द-ओ-ग़म में वो रहे हैं हाँ मगर फिर भी मोहब्बत से शजर को चूमते हैं तुम कभी लगती हो उस महताब की मानिंद मुझ को मैं जिसे बाम-ए-फ़लक पर मुस्कुराता देखता हूँ वो के जिस की रौशनी में रात भर मैं भीगता हूँ पा नहीं सकता उसे मिलता है फिर भी क्यूँ सूकूं सा जब कभी दरिया में उस का अक्स बनता देखता हूँ फिर कभी उस रात का इक रूप लगती हो मुझे तुम जो मेरी दिन भर की सारी ही थकन को चूर कर दे जब कभी दुनिया के रंज-ओ-ग़म से मैं आजिज़ हो जाऊँ वो मुझे आग़ोश में ले कर ग़मों को दूर कर दे तुम कभी उस ख़्वाब के जैसी भी लगती हो मुझे जो हर सुब्ह चहरे पे इक मुस्कान दे जाता है यूँँ ही ख़्वाब ऐसा के नहीं आसान जिस को भूल पाना दिल गवारा कर नहीं सकता है जिस का टूट जाना ख़ूब-सूरत है सभी बातें तुम्हारी और तुम ख़ूब-सूरत है ये अंदाज़-ए-बयां जो है तुम्हारा वो तुम्हारा प्यार से कहना के चलते हैं कहीं हम दूर सहराओं में चल कर काटते हैं ज़िंदगी हम कौन हो तुम और क्या लगती हो मेरी क्या पता क्यूँ मैं तुम सेे आ मिला और क्या है अपना राबता इन सवालों का ज़ख़ीरा इस जहाँ पर छोड़ दो जो नहीं है अपने बस में वो ख़ुदा पर छोड़ दो
Haider Khan
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रिवाज अजब रिवाज हैं दुनिया ने जो बनाएँ हैं, के औरतें तो घरों के लिए बलाएँ हैं। किसी ने बोझ समझ कर घरों में रक्खा तो, किसी ने बोल दिया ये तो बद-दुआएँ हैं। किसी ने ज़ुल्म किया इन पे और फिर बोला, के औरतें तो फ़कत मर्द की क़बाएँ हैं। जो मर्द ओढ़ ले जब भी कभी हो जी उस का, या फिर उतार के पामाल वो करे उनको। कभी उठा के उन्हें ताज सा रखे सर पर, कभी अज़ाब सा बद-हाल वो करे उनको। जो लोग आज है मूरत बने शराफ़त की, ख़ुद औरतों को निगाहों से तौल देते हैं। उछालते हैं शहर भर में इज़्ज़तें सबकी, घरों में लौट के फिर माँ के पाँव छूते हैं। है औरतों की भी इज़्ज़त ये भूल जाते हैं, ये उन की शक्ल पे बदना मियाँ सजाते हैं। ये जिस की कोख में पाते हैं ज़िन्दगी अपनी, उसी की ज़ात को सौदे में बेच खाते हैं। हवस की आग बुझाने के वास्ते ये लोग, किसी के जिस्म से जब मन हो खेल आते हैं। ये औरतें ही तो होती हैं हौसलों की मिसाल, फिर आज क्यूँ हैं ज़माने के सामने ये निढाल। गली-गली से गुज़रती है सहमी सी औरत, क़दम-क़दम पे सताता है आबरू का ख़याल। अगर बचा न सकी आज आबरू अपनी, तो ये समाज उसी से तो फिर करेगा सवाल।
Haider Khan
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सरहद कभी सरहद पे जब दुश्मन ने अंगारें बिछाईं थीं हिमालय पर वो जब बारूद की नदियाँ बहाईं थीं यही था वक़्त जब हम को वतन की इक सदा आई ख़ुशी से सैकड़ों जाने वतन पर तब लुटाईं थीं मैं इक घर छोड़ आया था, करोड़ों घर बचाने थे कई वादे वतन से जो किए थे वो निभाने थे वफ़ा मेरी कभी सरहद से आ कर पूछ लेना तुम लहू मेरा वहीं छलका जहाँ गुज़रे ज़माने थे मेरी वर्दी से तो अब तक वफ़ा की ख़ुशबू आती है फज़ा ये आज भी क़िस्से शहादत के सुनाती है सदाएं जब कभी जन गण की उठती हैं यहाँ पर तो फ़लक ये काँप उठता है, ज़मीं ये थरथराती है इसी सरहद पे माँओं ने कई बेटे गंवाए थे इसी सरहद पे भाई से बिछड़ कर बहने रोईं थीं किसी ने जब जवाँ बेटे का लाशा सामने देखा न जाने कितने बरसों तक वो आँखें फिर न सोईं थीं मेरा भी एक क़िस्सा था, मेरी भी इक कहानी थी वतन के नाम मैं ने भी लिखी अपनी जवानी थी कई बातें थी दिल में जो कभी मैं कह नहीं पाया मुझे भी दास्ताँ सारी किसी को तो सुनानी थी कई लोगों का होगा ज़िक्र मेरे इस फ़साने में कई लोगों से बिछड़ा हूँ मैं सरहद को बचाने में मैं घर का इक दिया था जो के रौशन हो रहा था और किसी झोके ने इक पल भी नहीं सोचा बुझाने में मेरे दर से कभी बाद-ए-सबा तेरा गुज़र हो तो मेरी महबूब से कहना उसे मैं याद करता था मेरी हस्ती मिटे लेकिन उसे इक आँच ना आए ख़ुदा से हर घड़ी मैं बस यही फरयाद करता था उसे ये पूछना के क्या सुनाई दे रहा हूँ मैं उसे क्या अपनी बेटी में दिखाई दे रहा हूँ मैं उसे कहना के आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती बड़ा मजबूर हो कर ये जुदाई दे रहा हूँ मैं उसे कहना उसे मैं फिर किसी दिन मिलने आउँगा सुब्ह की धूप सा चहरे पे उस के झिलमिलाउँगा मिला हूँ मैं जो इस मिट्टी में तो फिर एक ना इक दिन कोई पौधा बनूँगा और फिर मैं लहलाहाऊंगा मेरी मां से ये कह देना के उस के हाथ का ख़ाना मैं ख़ाना चाहता तो था मगर ये हो नहीं पाया मुझे इक ख़त मिला था जिस में मां ने घर बुलाया था मैं जाना चाहता तो था मगर ये हो नहीं पाया मेरी मां से ये कहना के दुआ ने रंग लाया है तेरा बेटा लहू में भीग कर भी मुस्कुराया है उसे कहना ये वा'दा था उसे मैं मिलने आउँगा क़फ़न में ही सही मैं ने ये वा'दा भी निभाया है मेरे बाबास भी पूछो उन्हें क्या गर्व है मुझ पर वतन की आन की ख़ातिर जो मैं ने जाँ गवाई थी उन्हें कहना के बेटा आप का वादे का पक्का है न पीछे वो हटा, गोली सभी सीने पे खाई थी उन्हें कहना की उन सी शख़्सियत ना है ज़माने में न ऐसी दौलतें मिलती हैं जन्नत के खज़ाने में मेरी बहनों से मिलना तो उन्हें पैगाम ये देना के भाई अब नहीं तो क्या ख़ुदाई तो सलामत है हुआ क्या जो के दुश्मन ने किया धड़ से अलग सर को लो बांधों राखियां इस में कलाई तो सलामत है जो बहनों के लिए हो पुर-फ़ज़ा वो बन के आऊँगा हिफाज़त जो करे उन की दुआ वो बन के आऊँगा कभी सरहद को फिर मेरी ज़रूरत गर पड़ी तो मैं जो ललकारेगी दुश्मन को सदा वो बन के आऊँगा मुझे मुर्दा जो कहते हैं उन्हें जा कर ये कह देना तिरंगे को जो लहराए हवा वो बन के आऊँगा
Haider Khan
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