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चेहरे बे-शुमार चेहरे नज़र आते हैं ज़िंदगी की राहों पर नाक नक़्श नहीं हो बहुत मुख़्तलिफ़ उन में से एक ही चेहरा सब से हसीन लगता है क्यूँँ जब हक़ीक़त में ऐसा है नहीं क्या सच ही कहा गया है कि ख़ूब-सूरती देखने वालों की आँखों में बस्ती है या फिर इश्क़ करने वाले हुस्न को सही पहचानते हैं रूह की नज़रों से

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे

Gorakh Pandey

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याद एक बे-रंग बे-महक मुरझाया हुआ गुलाब जिस के काँटों की चुभन बाक़ी रहती है सदा याद-ए-माज़ी की बनाई हुई एक धुँदली तस्वीर मेल नहीं खाता जिस से हाल का चेहरा फिर भी लगी है दिल की दीवार पर याद टूटा-फूटा एक ऐसा खिलौना जिस से इंसान दिल बहलाना चाहे बे-कार होने के बावजूद उसे फेंकना नहीं चाहे याद एक सराब ज़ीस्त के रेगिस्तान में जो और भी बढ़ा दे थके हारे मुसाफ़िर की प्यास

Elizabeth Kurian Mona

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लाश को दफ़नाना आसान काम नहीं है मरने वाले के अहबाब को लगता है कि वो अभी तक ज़िंदा है और किसी भी वक़्त उठ कर उन्हें गले लगा सकता है यही सोच कर वो इस लाश के दामन को छोड़ना नहीं चाहते कोई मो'जिज़ा होने पर ही लाश में जान आ सकती है चाहे वो मौत इंसान की हो या किसी रिश्ते की

Elizabeth Kurian Mona

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कितनी दिलकश होती हैं ख़ुश-फ़हमियाँ ख़त्म होने से पहले बड़े रंगीन होते हैं ख़्वाब बिखरने से पहले बहुत हसीन होते हैं फूल मुरझाने से पहले बेहद ख़ूब-सूरत होती है मोहब्बत बे-वफ़ाई से पहले हर आग़ाज़ पहुँचता है अंजाम को मिलन का पीछा करती है जुदाई दिन के पहलू में रहती है रात और ज़िंदगी का दामन था में साया सी चलती है मौत ज़िंदगी के उतार-चढ़ाओ दिल पर छोड़ जाते हैं नक़्श अगर इंसान का बस चलता क्या वो ख़ुशी के पल ही नहीं चुनता

Elizabeth Kurian Mona

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मैं उस सिगरेट का टुकड़ा हूँ जिसे तुम ने पिया था अपनी ख़ुशी के लिए और अब अपने जूते से मसल देना चाहते हो ताकि उस की चिंगारी आग न लगा दे तुम्हारे लकड़ी-नुमा वजूद को महफ़ूज़ रहने की तुम्हारी ख़्वाहिश तुम्हारे जज़्बात को सुन कर देती है किसी दूसरे की तड़प तुम पर कोई असर नहीं करती सिगरेट के बचे टुकड़े को आसानी से फेंक सकते हो मगर इस धुएँ का क्या करोगे जो तुम्हारे दिल में भर गया है

Elizabeth Kurian Mona

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ज़िंदगी के नाटक में एक अदाकारा हूँ मैं ये होगा अलमिया या रज़मिया कौन बता सकता है जब पर्दा उठता है मुझे अपना किरदार अदा करना होता है कुछ सोचे-समझे बग़ैर दूसरे अदाकारों के इशारों पर बोलने पड़ते हैं अपने मुकाल में मेरे किरदार हैं बे-शुमार मुख़्तलिफ़ जज़्बात लिए मदद करने के लिए मुझे पस-ए-पर्दा कोई नहीं है क्या मैं ने अपना किरदार सहीह निभाया जो कहना था सही कहा सही ढंग से क्या मैं ना-कामयाब थी क्या सामईन की तालियाँ और नक़्क़ादों की दाद मैं ने हासिल की या फिर सब की नज़रों में गिर गई इन सवालात का वक़्त ही जवाब देगा पर्दा गिरने के बा'द

Elizabeth Kurian Mona

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