“किताब” एक किताब थी पास मेरे वही जिसे पढ़ने में आलस आता था लगता था जो हमेशा डेस्क पर रखी रहेगी धूल खाएगी कहाँ जाएगी जाएगी नहीं कहीं कौन पढ़ेगा उस किताब को जिस में भाव का अभाव है झूठ का प्रभाव है फिर एक दिन एक झूठा मुझ सेे वो किताब ले गया
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
Allama Iqbal
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पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है, वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है, वो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है, उस को छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है, उस को इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पढ़ सकती हैं, हम ने जिन को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी-कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती है सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है, सिर्फ़ उसी के हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है, हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में ज़िंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है, हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है, उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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“जंग” जब राइफ़लें नहीं गाएँगी लोरियाँ और बारूद की महक को बच्चे इत्र समझ कर नहीं सूँघेंगे जब हर घर में दीवारों की जगह दरवाज़े होंगे खुले हुए तो समझ लेना जंग थक चुकी होगी जब खूँख़ार हुकूमतें किसी खेत की मेड़ पर बैठ कर फ़सलें उगाने लगेंगी और टैंकों की जगह कुआँ खोदने वाले औज़ार बाँटेंगी तो समझ लेना सियासत भी शर्मिंदा हो चली होगी जब शे'र कहने वाले ज़ख़्मों की गिनती नहीं करेंगे बल्कि मुहब्बत की बारिशों को बाँधने लगेंगे मतले में और कोई बच्चा बम की जगह काग़ज़ की नाव बनाएगा तो समझ लेना इंसानियत लौट आई होगी और हाँ जब एक शाम सीमा की दो ओर बैठे सिपाही एक ही सूरज को देख कर कहेंगे चलो घर चलते हैं तो उस दिन जंग वाक़ई ख़त्म हो चुकी होगी
Aryan Mishra
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घर घर क्या होता है ये वो कमरों से बना हुआ चौखाना है क्या जिस के एक कमरे की अटारी में सूखे हुए गुलदस्ते रक्खे हुए हैं और नए फूल वास में इंतिज़ार कर रहे हैं उन के साथ मिल जाने का
Aryan Mishra
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"आदत" वो साथ था आबाद था जैसे तैसे निकला ही था ख़ुद से ख़ुद को पीछे छोड़ कर पर एक आदत से निकलने के लिए दूसरी आदत डाल ली डाल ली फिर से आदत कुछ अटपटे से नाम देने की काम देने की मेरी सुब्ह मेरी शाम देने की आदत डाल ली फिर से मैं ने निकाल ली मैं ने वो पोशाकें जो कभी दोबारा नहीं पहनने का मन बनाया था तन नहीं सजाया था सालों से मैं ने अरसे बीत गए थे ख़ुद को दूसरे की आँखों के पानी में देखे पर फिर भी आदत डाल ली मैं ने फिर से कुछ केशों को गालों पर सजाने की फिर से इस सीने की इक तकिया बनाने की फिर से अक्सर रात में घर देर जाने की ग़लतियाँ सारी किसी की भूल जाने की आदत डाल ली फिर से
Aryan Mishra
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