nazmKuch Alfaaz

"आँसू" मेरे पहलू में जो बह निकले तुम्हारे आँसू बन गए शाम-ए-मोहब्बत के सितारे आँसू देख सकता है भला कौन ये पारे आँसू मेरी आँखों में न आ जाएँ तुम्हारे आँसू शम्अ'' का अक्स झलकता है जो हर आँसू में बन गए भीगी हुई रात के तारे आँसू मेंह की बूँदों की तरह हो गए सस्ते क्यूँँ आज मोतियों से कहीं महँगे थे तुम्हारे आँसू साफ़ इक़रार-ए-मोहब्बत हो ज़बाँ से क्यूँँकर आँख में आ गए यूँँ शर्म के मारे आँसू हिज्र अभी दूर है मैं पास हूँ ऐ जान-ए-वफ़ा क्यूँँ हुए जाते हैं बेचैन तुम्हारे आँसू सुब्ह-दम देख न ले कोई ये भीगा आँचल मेरी चुग़ली कहीं खा दें न तुम्हारे आँसू अपने दामान ओ गरेबाँ को मैं क्यूँँ पेश करूँँ हैं मिरे इश्क़ का इन'आम तुम्हारे आँसू दम-ए-रुख़्सत है क़रीब ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त ख़ुश हो करने वाले हैं जुदाई के इशारे आँसू सदक़े उस जान-ए-मोहब्बत के मैं 'अख़्तर' जिस के रात भर बहते रहे शौक़ के मारे आँसू

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर" ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें हम भूले हुओं को याद न कर पहले ही बहुत नाशाद हैं हम तू और हमें नाशाद न कर क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ ये ताज़ा सितम ईजाद न कर यूँँ ज़ुल्म न कर बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया हाथों से ख़ुशी का जाम छुटा होंटों से हँसी का नाम गया ग़मगीं न बना नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर हम रातों को उठ कर रोते हैं रो रो के दुआएँ करते हैं आँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश सर धुनते हैं आहें भरते हैं ऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं ये ज़ुल्म तू ऐ जल्लाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर ये रोग लगा है जब से हमें रंजीदा हूँ मैं बीमार है वो हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश बे-ख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो जीने पे इधर बेज़ार हूँ मैं मरने पे उधर तयार है वो और ज़ब्त कहे फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जिस दिन से बँधा है ध्यान तिरा घबराए हुए से रहते हैं हर वक़्त तसव्वुर कर कर के शरमाए हुए से रहते हैं कुम्हलाए हुए फूलों की तरह कुम्हलाए हुए से रहते हैं पामाल न कर बर्बाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर बे-दर्द! ज़रा इंसाफ़ तो कर इस उम्र में और मग़्मूम है वो फूलों की तरह नाज़ुक है अभी तारों की तरह मासूम है वो ये हुस्न सितम! ये रंज ग़ज़ब! मजबूर हूँ मैं मज़लूम है वो मज़लूम पे यूँँ बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं वो शोख़-ए-हज़ीं बद-नाम न हो वो माह-लक़ा बद-नाम न हो वो ज़ोहरा-जबीं बद-नाम न हो नामूस का उस के पास रहे वो पर्दा-नशीं बद-नाम न हो उस पर्दा-नशीं को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर उम्मीद की झूटी जन्नत के रह रह के न दिखला ख़्वाब हमें आइंदा की फ़र्ज़ी इशरत के वादों से न कर बेताब हमें कहता है ज़माना जिस को ख़ुशी आती है नज़र कमयाब हमें छोड़ ऐसी ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर क्या समझे थे और तू क्या निकला ये सोच के ही हैरान हैं हम है पहले-पहल का तजरबा और कम-उम्र हैं हम अंजान हैं हम ऐ इश्क़! ख़ुदारा! रहम-ओ-करम मासूम हैं हम नादान हैं हम नादान हैं हम नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर वो राज़ है ये ग़म आह जिसे पा जाए कोई तो ख़ैर नहीं आँखों से जब आँसू बहते हैं आ जाए कोई तो ख़ैर नहीं ज़ालिम है ये दुनिया दिल को यहाँ भा जाए कोई तो ख़ैर नहीं है ज़ुल्म मगर फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर दो दिन ही में अहद-ए-तिफ़्ली के मासूम ज़माने भूल गए आँखों से वो ख़ुशियाँ मिट सी गईं लब को वो तराने भूल गए उन पाक बहिश्ती ख़्वाबों के दिलचस्प फ़साने भूल गए इन ख़्वाबों सी यूँँ आज़ाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर उस जान-ए-हया का बस नहीं कुछ बे-बस है पराए बस में है बे-दर्द दिलों को क्या है ख़बर जो प्यार यहाँ आपस में है है बेबसी ज़हर और प्यार है रस ये ज़हर छुपा इस रस में है कहती है हया फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर आँखों को ये क्या आज़ार हुआ हर जज़्ब-ए-निहाँ पर रो देना आहंग-ए-तरब पर झुक जाना आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ पर रो देना बरबत की सदा पर रो देना मुतरिब के बयाँ पर रो देना एहसास को ग़म बुनियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर हर दम अबदी राहत का समाँ दिखला के हमें दिल-गीर न कर लिल्लाह हबाब-ए-आब-ए-रवाँ पर नक़्श-ए-बक़ा तहरीर न कर मायूसी के रमते बादल पर उम्मीद के घर तामीर न कर तामीर न कर आबाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर जी चाहता है इक दूसरे को यूँँ आठ पहर हम याद करें आँखों में बसाएँ ख़्वाबों को और दिल में ख़याल आबाद करें ख़ल्वत में भी हो जल्वत का समाँ वहदत को दुई से शाद करें ये आरज़ुएँ ईजाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर दुनिया का तमाशा देख लिया ग़मगीन सी है बेताब सी है उम्मीद यहाँ इक वहम सी है तस्कीन यहाँ इक ख़्वाब सी है दुनिया में ख़ुशी का नाम नहीं दुनिया में ख़ुशी नायाब सी है दुनिया में ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

Akhtar Shirani

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