nazmKuch Alfaaz

फैलता फैलता शाम-ए-ग़म का धुआँ इक उदासी का तनता हुआ साएबाँ ऊँचे ऊँचे मिनारों के सर पे रवाँ देख पहुँचा है आख़िर कहाँ से कहाँ झाँकता सूरत-ए-ख़ैल-ए-आवारगाँ ग़ुर्फ़ा ग़ुर्फ़ा बहर काख़-ओ-कू शहर में दफ़अ'तन सैल-ए-ज़ुल्मात को चीरता जल उठा दूर बस्ती का पहला दिया पंछियों ने भी पच्छिम का रस्ता लिया ख़ैर जाओ अज़ीज़ो मगर देखना एक जुगनू भी मिशअल सी ले के चला है उसे भी कोई जुस्तुजू शहर में? आसमाँ पर रवाँ सुरमई बादलो हाँ तुम्हीं क्या उड़ो और ऊँचे उड़ो बाग़-ए-आलम के ताज़ा शगुफ़्ता गुलू बे-नियाज़ाना महका करो ख़ुश रहो लेकिन इतना भी सोचा, कभी ज़ालिमो! हम भी हैं आशिक़-ए-रंग-ओ-बू शहर में कोई देखे ये मजबूरियाँ दूरियाँ एक ही शहर में हम कहाँ तुम कहाँ दोस्तों ने भी छोड़ी हैं दिल-दारियाँ आज वक़्फ़-ए-ग़म-ए-उल्फ़त-ए-राएगाँ हम जो फिरते हैं वहशत-ज़दा सरगिराँ थे कभी साहिब-ए-आबरू शहर में लोग तानों से क्या क्या जताते नहीं ऐसे राही तो मंज़िल को पाते नहीं जी से इक दूसरे को भुलाते नहीं सामने भी मगर आते जाते नहीं और जाएँ तो आँखें मिलाते नहीं हाए क्या क्या नहीं गुफ़्तुगू शहर में चाँद निकला है दाग़ों की मिशअल लिए दूर गिरजा के मीनारों की ओट से आ मिरी जान आ एक से दो भले आज फेरे करें कूचा-ए-यार के और है कौन दर्द-आश्ना बावरे! एक मैं शहर में, एक तू शहर में

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

Shadab Javed

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"इंतिज़ार" एक उम्र गुज़ार चुके तो महसूस किया है जिसे उम्र भर चाहा वो मग़रूर हुआ है एक शख़्स का इंतिज़ार हर वक़्त किया है वो जा चुका है हमें अब यक़ीन हुआ है तिरे इंतिज़ार ने बालों को सफेद किया है हम समझते रहे ये धूल का किया है

ALI ZUHRI

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ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता

Ibn E Insha

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लब पर नाम किसी का भी हो, दिल में तेरा नक़्शा है ऐ तस्वीर बनाने वाली जब से तुझ को देखा है बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है नीले पर्बत ऊदी धरती, चारों कूट में तू ही तू तुझ से अपने जी की ख़ल्वत तुझ से मन का मेला है आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है ले जानी अब अपने मन के पैराहन की गिर्हें खोल ले जानी अब आधी शब है, चार तरफ़ सन्नाटा है तूफ़ानों की बात नहीं है, तूफ़ाँ आते जाते हैं तू इक नर्म हवा का झोंका, दिल के बाग़ में ठहरा है या तू आज हमें अपना ले, या तू आज हमारा बन देख कि वक़्त गुज़रता जाए कौन अबद तक जीता है फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैं हिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है

Ibn E Insha

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इंशा'-जी ये कौन आया किस देस का बासी है होंटों पे तबस्सुम है आँखों में उदासी है ख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा है या सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा है तरसी हुई नज़रों को अब और न तरसा रे ऐ हुस्न के सौदागर ऐ रूप के बंजारे रमना दिल-ए-'इंशा' का अब तेरा ठिकाना हो अब कोई भी सूरत हो अब कोई बहाना हो ख़ाकिस्तर-ए-दिल को है फिर शोला-ब-जाँ होना हैरत का जहाँ होना हसरत का निशाँ होना ऐ शख़्स जो तू आ कर यूँँ दिल में समाया है तू दर्द कि दरमाँ है तो धूप कि साया है? नैनाँ तिरे जादू हैं गेसू तिरे ख़ुश्बू हैं बातें किसी जंगल में भटका हुआ आहू हैं मक़्सूद-ए-वफ़ा सुन ले क्या साफ़ है सादा है जीने की तमन्ना है मरने का इरादा है

Ibn E Insha

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कल हम ने सपना देखा है जो अपना हो नहीं सकता है उस शख़्स को अपना देखा है वो शख़्स कि जिस की ख़ातिर हम इस देस फिरें उस देस फिरें जोगी का बना कर भेस फिरें चाहत के निराले गीत लिखें जी मोहने वाले गीत लिखें धरती के महकते बाग़ों से कलियों की झोली भर लाएँ अंबर के सजीले मंडल से तारों की डोली भर लाएँ हाँ किस के लिए सब उस के लिए वो जिस के लब पर टेसू हैं वो जिस के नैनाँ आहू हैं जो ख़ार भी है और ख़ुश्बू भी जो दर्द भी है और दारू भी वो अल्हड़ सी वो चंचल सी वो शाइ'र सी वो पागल सी लोग आप-ही-आप समझ जाएँ हम नाम न उस का बतलाएँ ऐ देखने वालो तुम ने भी उस नार की पीत की आँचों में इस दिल का तीना देखा है? कल हम ने सपना देखा है

Ibn E Insha

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देख तो गोरी किसे पुकारे बस्ती बस्ती द्वारे द्वारे बर में झोली हाथ में कासा घूम रहा है पीत का प्यासा दिल में आग दबी है डरना आँखों में अश्कों का झरना लब पर दर्द का बारा-मासा घूम रहा है पीत का प्यासा काँटों से छलनी हैं पाँव धूप मिली चेहरे पर छाँव आस मिली आँखों में निरासा घूम रहा है पीत का प्यासा बात हमारी मान के गोरी सब दुनिया से चोरी चोरी घूँघट का पट खोल ज़रा सा घूम रहा है पीत का प्यासा सूरत है 'इंशा'-जी की सी बाल परेशाँ आँखें नीची नाम भी कुछ 'इंशा'-जी का सा घूम रहा है पीत का प्यासा सोच नहीं साजन को बुला ले आगे बढ़ सीने से लगा ले तुझ-बिन दे इसे कौन दिलासा घूम रहा है पीत का प्यासा

Ibn E Insha

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