nazmKuch Alfaaz

मैं आँधियों की सियाह यलग़ार से बचा भी तो अपनी मंज़िल न पा सकूँगा कि रास्ते मैं ने अपने बदल दिए हैं तमाम बे-लौस हौसले भी कुचल दिए हैं सफ़र मिरा अब शुरूअ' हुआ है शुरूअ' रहेगा हुजूम मिलने तो दो कहीं पर क़दम न होंगे मिरे ज़मीं पर बढ़ो बढ़ो की सदा-ए-माज़ी बदन के सातों तबक़ में होगी तो क्या करूँँगा कि मेरे अंदर ख़ुदा नहीं है जो रोक लेगा सफ़र मिरा अब शुरूअ' रहेगा

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मुझे क्या ख़बर थी कि तुम मेरी उँगली पकड़ कर चलोगी शब की तारीक सरहद से बाहर निकलते ही दिन के उजाले में पहला क़दम रखते ही मुस्कुरा कर कहोगी देखिए शुक्रिया अब यहाँ से मैं सूरज की किरनों के हमराह ख़ुद ही चली जाऊँगी और मैं मुड़ के देखूँगा उन रास्तों को जो यूँँ शब-ज़दा हो चुके हों कि अपना पता खो चुके हों

Zafar Zaidi

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मेहरबाँ साअ'त ने अपनी गोद में फूलों का गुलदस्ता सजाया हवाओं को बुलाया और कहा देखो ज़मीं से आसमाँ तक हद्द-ए-तख़य्युल-ओ-बयाँ तक मकाँ से ला-मकाँ तक तुम जहाँ तक जाओ मेरी ख़ुशबुएँ हमराह ले जाओ कि इमशब अर्श से ऐसा सितारा मैं ने पाया कि घर मेरा मुनव्वर हो गया आज ही के दिन हमारे दर पे सूरज ने सदा दी थी यही वो दिन है जब हम पर हमारे घर के दरवाज़े खुले थे

Zafar Zaidi

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हमारी दस्तरस में क्या है क्या नहीं ज़मीं नहीं ख़ला नहीं कि आसमाँ नहीं हमें तो सिर्फ़ सोचना ये चाहिए कि मुट्ठियाँ खुली रहें हथेलियों से उँगलियाँ जुड़ी रहें ज़मीं से पाँव पाँव से क़दम क़दम से रास्तों का सिलसिला बना रहे हमें तो सिर्फ़ देखना ये चाहिए कि जिस को लोग रद्द करें और अपनी दीद की ग़लीज़ चादरों से ढाँप कर शिकायतों से बाँध दें हमारे जिस्म मावरा हों उस ग़िलाफ़ से हमारी दस्तरस में क्या है क्या नहीं बस यही तो शर्त है हमारे जिस्म अन-गिनत रहें मगर हमारे सर जुड़े रहें रगों में प्यार का लहू रवाँ रहे बदन बदन जवाँ रहे ज़मीं रहे ख़ला रहे न आसमाँ रहे मगर हमें यही गुमाँ रहे हमारी दस्तरस में क्या नहीं

Zafar Zaidi

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एक दिन छुट्टी का यूँँ गुज़रा कि मुझ को दिख गए सातों तबक़ चाँद की बुढ़िया ख़लाओं की हदें सूरज का घर और क्या देखा कहाँ देखा बयाँ करता चलूँ शहर से बाहर समुंदर के क़रीब रेत पर फैला हुआ रंगीं जवाँ जिस्मों का गोश्त जा-ब-जा फैले हुए बुस्तान रानें पिंडलियाँ शर्म-गाहें अपनी कुत्तों से छुपाए लड़कियाँ और जो देखा वो आँखें देख कर पथरा गईं और मैं दोज़ख़-ज़दा जन्नत में बैठा रह गया

Zafar Zaidi

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अजीब लड़की है वो कि उस को ख़ुदा बनाया तो वो ख़फ़ा है चहार जानिब इबादतों का हिसार खींचा मसाफ़तों के शजर उगाए हिरास की वुसअ'तों को मैं ने तिलिस्म-ए-सौत-ओ-सदास बाँधा हवाओं को सम्त-ए-आगही दी शबों के ज़ख़्मी कबूतरों को लहू पिलाया फ़लक पे नीलाहटें बिखेरीं ख़ला में क़ौस-ए-क़ुज़ह के रंगीन पर उड़ाए निगाह-ओ-दिल की फ़सील पर जिस्म-ओ-जाँ सजाए बदन उगाए मगर वो लड़की ख़ुदाई पा कर भी मुज़्महिल है वो ख़ुश नहीं है वो कह रही थी कि तुम ने मुझ को ख़ुदा बनाया तो क्या ये समझूँ कि कोई मुझ से भी बाला-तर है

Zafar Zaidi

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