मुझे क्या ख़बर थी कि तुम मेरी उँगली पकड़ कर चलोगी शब की तारीक सरहद से बाहर निकलते ही दिन के उजाले में पहला क़दम रखते ही मुस्कुरा कर कहोगी देखिए शुक्रिया अब यहाँ से मैं सूरज की किरनों के हमराह ख़ुद ही चली जाऊँगी और मैं मुड़ के देखूँगा उन रास्तों को जो यूँँ शब-ज़दा हो चुके हों कि अपना पता खो चुके हों
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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एक दिन छुट्टी का यूँँ गुज़रा कि मुझ को दिख गए सातों तबक़ चाँद की बुढ़िया ख़लाओं की हदें सूरज का घर और क्या देखा कहाँ देखा बयाँ करता चलूँ शहर से बाहर समुंदर के क़रीब रेत पर फैला हुआ रंगीं जवाँ जिस्मों का गोश्त जा-ब-जा फैले हुए बुस्तान रानें पिंडलियाँ शर्म-गाहें अपनी कुत्तों से छुपाए लड़कियाँ और जो देखा वो आँखें देख कर पथरा गईं और मैं दोज़ख़-ज़दा जन्नत में बैठा रह गया
Zafar Zaidi
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मेहरबाँ साअ'त ने अपनी गोद में फूलों का गुलदस्ता सजाया हवाओं को बुलाया और कहा देखो ज़मीं से आसमाँ तक हद्द-ए-तख़य्युल-ओ-बयाँ तक मकाँ से ला-मकाँ तक तुम जहाँ तक जाओ मेरी ख़ुशबुएँ हमराह ले जाओ कि इमशब अर्श से ऐसा सितारा मैं ने पाया कि घर मेरा मुनव्वर हो गया आज ही के दिन हमारे दर पे सूरज ने सदा दी थी यही वो दिन है जब हम पर हमारे घर के दरवाज़े खुले थे
Zafar Zaidi
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मैं आँधियों की सियाह यलग़ार से बचा भी तो अपनी मंज़िल न पा सकूँगा कि रास्ते मैं ने अपने बदल दिए हैं तमाम बे-लौस हौसले भी कुचल दिए हैं सफ़र मिरा अब शुरूअ' हुआ है शुरूअ' रहेगा हुजूम मिलने तो दो कहीं पर क़दम न होंगे मिरे ज़मीं पर बढ़ो बढ़ो की सदा-ए-माज़ी बदन के सातों तबक़ में होगी तो क्या करूँँगा कि मेरे अंदर ख़ुदा नहीं है जो रोक लेगा सफ़र मिरा अब शुरूअ' रहेगा
Zafar Zaidi
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हमारी दस्तरस में क्या है क्या नहीं ज़मीं नहीं ख़ला नहीं कि आसमाँ नहीं हमें तो सिर्फ़ सोचना ये चाहिए कि मुट्ठियाँ खुली रहें हथेलियों से उँगलियाँ जुड़ी रहें ज़मीं से पाँव पाँव से क़दम क़दम से रास्तों का सिलसिला बना रहे हमें तो सिर्फ़ देखना ये चाहिए कि जिस को लोग रद्द करें और अपनी दीद की ग़लीज़ चादरों से ढाँप कर शिकायतों से बाँध दें हमारे जिस्म मावरा हों उस ग़िलाफ़ से हमारी दस्तरस में क्या है क्या नहीं बस यही तो शर्त है हमारे जिस्म अन-गिनत रहें मगर हमारे सर जुड़े रहें रगों में प्यार का लहू रवाँ रहे बदन बदन जवाँ रहे ज़मीं रहे ख़ला रहे न आसमाँ रहे मगर हमें यही गुमाँ रहे हमारी दस्तरस में क्या नहीं
Zafar Zaidi
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अजीब लड़की है वो कि उस को ख़ुदा बनाया तो वो ख़फ़ा है चहार जानिब इबादतों का हिसार खींचा मसाफ़तों के शजर उगाए हिरास की वुसअ'तों को मैं ने तिलिस्म-ए-सौत-ओ-सदास बाँधा हवाओं को सम्त-ए-आगही दी शबों के ज़ख़्मी कबूतरों को लहू पिलाया फ़लक पे नीलाहटें बिखेरीं ख़ला में क़ौस-ए-क़ुज़ह के रंगीन पर उड़ाए निगाह-ओ-दिल की फ़सील पर जिस्म-ओ-जाँ सजाए बदन उगाए मगर वो लड़की ख़ुदाई पा कर भी मुज़्महिल है वो ख़ुश नहीं है वो कह रही थी कि तुम ने मुझ को ख़ुदा बनाया तो क्या ये समझूँ कि कोई मुझ से भी बाला-तर है
Zafar Zaidi
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