"महबूब की एक झलक" रूह में उतर गई शक्ल उस की जब नज़र उठाई तरफ़ उस की रेशमी लिबास में ज़ीनत थी वो दूध की तरह थी कमर उस की कान पर झूलती उस की बाली चूमती जाती थी गर्दन उस की तन से लिपटी ख़म भरी साड़ी दिखाती थी सुंदर कटि उस की आँखों की बनावट बादाम जैसी पूरे शबाब पर थी नज़र उस की गोरे रंग के बीच गले का ख़म कह रहा था चू में नर्मी उस की ज़िस्म की गढ़न थी यूँँ ढली मूरत आरज़ू हो कोई संग-तराश उस की हाथ थे बुतों की तरह तराशे हुए मक्खन जैसी फिसलन उस की बालों की लंबी लटकन छूती जाती कमर उस की पैरों ने पाई थी सीधी गठन केले के पेड़ सी उपमा उस की खिंचता हुआ उठा सीना था कसी हुई थी कमान उस की खिलते लब भरे-भरे से थे शहद से भरी पंखुड़ी उस की फूल की तरह का परी-चेहरा उजले रंग में सूरत उस की और क्या मिसाल दें हम 'अर्जुन' आफ़ताब जैसी झलक उस की
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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आप के लिए कभी हँसता था खिल-खिल कर कभी थी ज़िंदगी मेरी ये मजबूरी ये रुस्वाई ये बर्बादी हुई मेरी मैं अपने आप में अब तन्हा पहचाने हैं अनजाने घुटन के साथ अब है ये सिमटती ज़िंदगी मेरी गुनाहों की सज़ा होती तो सह लेता ख़ुशी से मैं ख़ता के बिन जहन्नम सी है नज़्म-ए-ज़िंदगी मेरी मुझे क्या इल्म था इल्ज़ाम झूठा भी लगाते हैं जलन दुनिया की इतनी क़त्ल कर दी शख़्सियत मेरी न घुटकर मौत आती है न घुटकर कोई जी सकता मुझे महसूस होता है ये ज़िंदा लाश है मेरी कभी दुश्मन नहीं थे सब कभी थी दोस्ती सब से न कोई दोस्त लगता अब न कोई दुश्मनी मेरी मेरे दिल में न कुछ बाक़ी जो अब भी टूट सकता हो ये टुकड़े जी रहे क्यूँँ-कर हैं हैरानी बढ़ी मेरी मुझे नफ़रत हुई ख़ुदस मैं क्यूँ कमज़ोर हूँ इतना मैं ख़ुद आया तेरे दर पे या क़िस्मत लाई है मेरी बहुत कुछ कह नहीं पाता बहुत कुछ कह भी जाता हूँ समझ में जो नहीं आए वो बस तस्लीम है मेरी तुझे आग़ाज़ करना है तुझे अंजाम है देना मिले मंज़िल नहीं मुझ को तो ये तक़दीर है मेरी मुझे मंज़ूर है मिटना मुझे मंज़ूर मरना पर मुझे जीने की ख़ातिर चाहिए आवारगी मेरी तू उतरी आसमाँ से है यहाँ धरती पे आई है फ़रिश्ता लग रही है तू ज़रूरत बन गई मेरी चलो ये बात छोड़ें अब चलो वो बात करते हैं कि ख़ुशबू बन के फैले कामयाबी की महक तेरी
arjun chamoli
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"छोटी सी मुलाक़ात" हम बचपन में खेलते हुए यूँँ जवाँ हो गए अरमाँ बिना कहे ही सब बयाँ हो गए बचपन में खेलते थे जो छुपने का खेल हम चाहते थे न ढूँढ़ पाए कोई छुपते थे ऐसे हम एक दिन पता चला कि हारा नहीं है कोई ढूँढा तो एक ने था पकड़े गए थे हम साँसें तो छू रही थी चुप चुप खड़े थे हम माना कि धड़कनों को रोके रहे थे हम दिल ने न मानी बात पसीने से नहा गए धड़कन थी इतनी तेज़ डरने लगे थे हम ऐसी मुलाक़ात कभी महसूस न की थी दोनों ने कभी ऐसी कोई बात न की थी ख़फ़ा हूँ ज़िन्दगी से वो वक़्त बीत क्यूँ गया उस के गुज़र जाने की कोई बात न की थी उस के गुज़र जाने की कोई बात न की थी
arjun chamoli
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"कभी वक़्त था" कभी वक़्त था देखा था उसे शर्माते हुए अपने आँचल को मेरे हाथों से बचाते हुए अकेले मिलने पर मुझ को रिझाते हुए मेरे हाथों से अपनी उँगलियाँ छुआते हुए सुनसान जगह पर ख़ुद को पीछे हटाते हुए जानी पहचानी जगह पर शोख़ी बढ़ाते हुए वो दौर था ख़ुश थे एक दूजे को सताते हुए और थक जाते थे नाराज़ को मनाते हुए प्यार है या नहीं डरते थे ये बताते हुए क़रीब रहते थे अपने अरमाँ जगाते हुए वही वक़्त फिर से चाहता है 'अर्जुन' बाँहों में ले-ले वो मुझ पे हक़ जताते हुए
arjun chamoli
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"सवेरे की उजली रौशनी में घिरी वो लड़की" सुब्ह उठ के वो निहारे खिलते नीले आसमाँ को देखती वो उगता सूरज और महकाती समाँ को पूछता सूरज उसी से उठ गई तो मैं भी आऊँ रौशनी वो तब बिखेरे सुब्ह होने की समाँ को रोज़ ही बाद-ए-सबा छू कर उसे लहराती है ज्यूँँ सोचता मैं वो न होती कौन लहराता समाँ को फूल खिलने के लिए ही इंतिज़ारी में मचलते और खिलते हैं चमन में जब निहारे वो समाँ को रोज़ महक उस से चुराए ये सबा छू कर उसे ही मिल रही ख़ुशबू सबास दे रही वो जो समाँ को काश उस के सामने मेरा भी घर होता कहीं पर देखता मैं सुब्ह उस को देखती वो जब समाँ को
arjun chamoli
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तुम आश्ना हो क्या तकरार गर भुलाई हो तो मुझे बता मेरी तरह अभी तक तुम आश्ना हो क्या यादों में हर जगह है मिलते जहाँ थे हम मुझ को नहीं पता था होगा कभी ये कम मंज़िल नहीं मिली थी कोशिश किए थे हम दो गाम ही चले थे फिर मुड़ गए थे हम वा'दा करो मोहब्बत में खा के ये क़सम हम साथ होंगे उन के जिन को कहें सनम अब हम कभी न बिछड़ें खाते हैं ये क़सम जानाँ नए सिरे से पूरी करें क़सम तुम गर जवाब दोगे आता हूँ मैं वहाँ सोचो ज़रा अभी तक तुम आश्ना हो क्या सोचो ज़रा अभी तक तुम आश्ना हो क्या
arjun chamoli
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