nazmKuch Alfaaz

"तसल्ली" तसल्ली अब भी ज़िन्दा है मगर अफ़्सोस इतना है न खुल बात करती है न ज़्यादा साँस लेती है फ़क़त दीमक-ज़दा वीरान कमरे और तन्हा तीरगी में सर झुकाए साँस लेती है किसी ख़ुश-बास मौसम में ख़मोशी तोड़ती है बोलती है गुनगुनाती है ओ मेरे यार ग़म मत कर वो इक दिन लौट आएगी तुझे अपना बनाएगी बिताए चार सालों में नए मौसम नहीं देखे नई ख़्वाहिश नहीं उट्ठी नया कब साल आता है ये सारे ही पुराने हैं वही दीमक-ज़दा वीरान कमरा वही आग़ोश में बैठी उदासी तसल्ली के तमाशे ने तमाशा कर दिया मुझ को तसल्ली के तमाशे मुझ सेे अब देखे नहीं जाते अमाँ ये जानलेवा है तसल्ली तेरे वादे की बेवा है तसल्ली

Related Nazm

"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

111 likes

"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

81 likes

मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

107 likes

"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

Arpit Sharma

13 likes

More from Anand Raj Singh

"ताबीरों की लाश" हम ने भी कुछ ख़्वाब बुने थे ख़्वाब हमारे गिने चुने थे ख़्वाबों में कब मैं होता था तुम होते थे ख़्वाबों में जब भी होते थे हम होते थे ख़्वाबों में आँगन देखा था प्यारा सा सावन देखा था ताबीरों पर बात हुई थी देखो किचन की बाईं जानिब शिव जी का मंदिर रखना है मैं ने शायद मना किया था रूठ गई थी झगड़ पड़ी थी ख़ूब लड़ी थी तुम्हें पता है जिस कमरे में मैं रहता हूँ वो कमरा अब भरा पड़ा है ख़्वाब तो ज़ाया' हो जाते हैं ताबीरों की लाश पड़ी है

Anand Raj Singh

6 likes

"अगर तुम न होती" अगर तुम न होती वबा के दिनों में तो मुझे कौन कहता है कि काढ़ा बना लो सुनो कुछ दिनों को मेरी बात मानो और ठंडी चीज़ों से ख़ुद को बचा लो बर्फ़ का ठंडा पानी जो मुँह से लगाता बताओ मुझे कौन नख़रे दिखाता भला कौन कहता है मुझे तुम सेे कोई बात करनी नहीं है जो मर्ज़ी में आए करो तुम मरो तुम मुझे मार डालो करो ख़ूब मन की अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता सुनो तुम सुनो ना मेरी जान सुन लो न रूठो तुम मुझ सेे चलो मान जाओ हमारे लिए ही तो बाग़-ए-बहिश्त से आदम और हव्वा निकाले गए हैं कभी हम मिलेंगे कभी हम बनेंगे हम इक दूजे के हाथों में हाथों को देकर इक मंज़िल चुनेंगे, उसी पर चलेंगे अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता हूँ तुम्हारी ये गहरी अंटलाटिक सी आँखों में कई टाइटैनिक दफ़न हो रहे हैं सँभालो इन्हें तुम बचा लो इन्हें तुम मुझे डूबने दो, मैं एंटिक बनूँगा अगर तुम न होती तो नज़्में ये ग़ज़लें किसे मैं सुनाता भला कौन कहता सताओ ना मुझ को रुलाओ ना मुझ को मेरी वहशतों से बचा लो ना मुझ को सुनो ना गले से लगा लो मुझ को

Anand Raj Singh

9 likes

"तैयब" वो अक्सर मुझ सेे कहती थी सुनो जब हम बड़े होंगे हम अपना घर बसाएँगे तो अपने बेटे को हम प्यार से तैयब बुलाएँगे अभी कुछ दिन ही बीते थे कि तैयब आ गया इक दिन ये तैयब वो नहीं था जो मेरे ख़्वाबों का हिस्सा था ये तैयब वो था जो उस की यादों में रहता था नहीं समझे हो जो अब भी सुनो तुम को मैं समझाऊँ मैं अपनी पहली मोहब्बत का दूजा इश्क़ था प्यारे सुना है अब वो कहती है सुनो तैयब सुनो तैयब कहो तो अपने बेटे को आनंद पुकारें अब

Anand Raj Singh

7 likes

" कॉफ़ी" शाम की उदासी में एक कप की कॉफ़ी में एक शय जो कॉमन थी वो तुम्हारी यादें थीं यार मेरी काॅफ़ी से जो तुम्हारा रिश्ता था वो तुम्हारे माथे के रंग से भी गहरा था तुम जो चाह लेती तो इन में देख सकती थी दुनिया भर के रंगों को नीले क्या, गुलाबी क्या, काग़ज़ी और प्याज़ी भी मूँगिया सफ़ेदी भी अब तुम्हें पता भी है रंग मेरी काॅफ़ी का शरबती या शराबी है बा'द तेरे कॉफ़ी की शीशी तोड़ दी हम ने कॉफ़ी छोड़ दी हम ने

Anand Raj Singh

3 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Anand Raj Singh.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Anand Raj Singh's nazm.