एक इक हर्फ़ सजा कर तुझे तहरीर किया ख़ून की नदियाँ बहा कर तुझे तहरीर किया दर्द में उम्र बिता कर तुझे तहरीर किया अब तो कहता है मिरा कोई भी किरदार नहीं मेरा किया है, मैं उन्हीं रास्तों में रहता हूँ मुझ को ये हुक्म है जा, जा के पत्थरों को तराश मैं अज़ल से इसी इक काम में लाया गया हूँ मैं कभी पीर, पयम्बर, कभी शाएर की सिफ़त तेरे बे-फ़ैज़ ज़माने में उतारा गया हूँ मैं तो बहता हुआ दरिया हूँ, समुंदर भी हूँ मैं तो जुगनू भी हूँ, तितली भी हूँ, ख़ुशबू भी हूँ मैं तो जिस रंग में भी आया हूँ, छाया गया हूँ तू अगर मुझ को न समझा तो ऐ मेरे हमदम मैं किसी रोज़ तिरे हाथ से खो जाऊँगा और तू वक़्त के तपते हुए सहराओं में हाथ मलता हुआ रोता हुआ रह जाएगा
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे
Rohit tewatia 'Ishq'
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सदाक़त-ए-इश्क़ इश्क़ की तुम हक़ीक़त समझ लो इस को ग़म से गुज़रना पड़ेगा उन की यादों में मसरूफ़ हो तुम उन की यादों में रहना पड़ेगा दर्द-ए-दिल अपना तुझ को सुनाऊँ जी तो करता है तुझ को सुनाऊँ तेरी आँखों से कह देंगी आँसू अब मुझे भी निकलना पड़ेगा अपने भी रूठ जाएँगे तेरे रिश्ते भी छूट जाएँगे तेरे लोग तुझ को कहेंगे निकम्मा ऐसा लम्हा भी सहना पड़ेगा तू भरोसा भी करता है जिस पे बे-वजह होगा नाराज़ तुझ से होता अक्सर यहाँ ऐसा आशिक़ इश्क़ से हाँ मुकरना पड़ेगा वो तुझे भूल जाएँगे ऐसे जाने ज़िंदा रहेगा तू कैसे मशवरा बस यही देगा 'दानिश' अलविदा तुझ को कहना पड़ेगा
Danish Balliavi
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"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ
ZafarAli Memon
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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अभी फिर से फूटेगी यादों की कोंपल अभी रग से जाँ है निकलने का मौसम अभी ख़ुशबू तेरी मिरे मन में हमदम सुब्ह शाम ताज़ा तवाना रहेगी अभी सर्द झोंकों की लहरें चली हैं कि ये है कई ग़म पनपने का मौसम सिसकने सुलगने तड़पने का मौसम दिसम्बर दिसम्बर दिसम्बर दिसम्बर
Nadeem Gullani
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मिले हम जो अब के कई साल ब'अद तुम्हें भी मलामत मुझे भी मलाल तुम्हारे भी चेहरे के फीके थे रंग मेरा चेहरा जैसे भटकता मलंग कई राज़ चुप की सदाओं में थे हमारी सुलगती वफ़ाओं में थे अजब वक़्त ओ मंज़र अजब माह-ओ-साल न कोई जवाब और न कोई सवाल बड़ी कोशिशें की कि इक हो सकें ज़रा खुल के हँस लें ज़रा रो सकें गुज़िश्ता के कुछ तो निशाँ धो सकें मगर अब ये मुमकिन कहाँ था 'नदीम' न पहले से दिन थे न पहले सी रात न पहले से लहजे न पहले सी बात न पहले सा हम पे मोहब्बत का जाल न पहले सा जीवन न ही माह-ओ-साल
Nadeem Gullani
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क्या ख़ूब हो गर इस दुनिया से सरहद का नाम ख़त्म हो जाए सारे देस.... सब के देस हों रूह को जिस्म और जिस्म को रूह से मिलने के लिए किसी वीज़े की ज़रूरत न हो जो चाहे, जब चाहे, जहाँ चाहे जिस से मिले.... जो चाहे, जब चाहे, जहाँ चाहे चला जाए.... कोई पाबंदी न हो..... काग़ज़ पे लगाई हुई लकीरों से दुनिया के इस नक़्शे पर नफ़रत बाँटने वालों के ख़्वाब अधूरे रह जाएँ.... क्या ख़ूब हो गर इस दुनिया से सरहद का नाम ख़त्म हो जाए
Nadeem Gullani
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