nazmKuch Alfaaz

"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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"क़िस्मत" कभी सोचता हूँ मेरा हक़ है उस पर वही जो किसी और की हो चुकी है वो लड़की जो क़िस्मत में मेरे लिखी थी लकीरों से मेरी कहीं खो चुकी है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ मगर अब करूँँ तो करूँँ क्या भला मैं निगाहों में उस का ही चेहरा बसा है उसी को ये दिल मानता अब ख़ुदा है ये दिल अब धड़कता ही उस के लिए है ये पागल तड़पता ही उस के लिए है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ मैं कितना अभागा हूँ कह भी न पाया पनाहों में अपनी छिपा लो ना मुझ को मेरी बेख़ुदी से बचा लो ना मुझ को मुझे चैन पड़ता नहीं बिन तुम्हारे घड़ी भर गले से लगा लो ना मुझ को सुनो तुम सेे इक राज़ की बात कह दूँ ये चाहत बनी ही हमारे लिए थी मोहब्बत बनी ही हमारे लिए थी नहीं मैं ये हरगिज़ नहीं मान सकता कोई मुझ सेे ज़्यादा तुम्हें चाहता है ये वो सच है जिस का तुम्हें भी पता है मेरे जैसा कोई दिवाना नहीं है मगर तुम को दिल ही लगाना नहीं है कभी सोचता हूँ जो मेरी नहीं हो तो जिस की हो उस सेे चुरा लू मैं तुम को कभी सोचता हूँ कि ग़ज़लों में अपनी पिरो कर ज़रा गुनगुना लूँ मैं तुम को मगर जैसे क़िस्मत बदल सी गई है कि जैसे हर इक शख़्स ने बस हमें दूर करने की साज़िश रची है ग़लत हो रहा है अगर ये सही है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ

Rohit tewatia 'Ishq'

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"नादान परी" वो मेरी नादान परी सब सेे छिपकर रहती थी अक्सर मुझ सेे कहती थी छोड़ो प्यार व्यार की बातें हिस्से आती तन्हा रातें इस सेे क्या ही मिल पाएगा जो है वो भी ख़ो जाएगा मैं ने सोचा सच ही तो है प्यार किसे ही मिल पाया है इस को तो एहसास दिला दूँ दुनिया से भी मैं लड़ लूँगा क़िस्मत से कैसे जीतूँगा मैं तो ये ग़म पाल ही लूँगा टूटा दिल सँभाल ही लूँगा वो तो सचमुच मर जाएगी और फिर कुछ ना कर पाएगी उस को एक जीवन जीना है मुझ को हर आँसू पीना है वैसे भी क्या ही है मुझ में मेरे जैसे कितने होंगे मेरे होने से क्या होगा बस इक गिनती बढ़ जाएगी उस के आगे अड़ जाएगी मेरा जाना ही बेहतर है साँस ही लेनी है ले लूँगा जान ही देनी है दे दूँगा जान तो वैसे भी उस की है उस को कहाँ मालूम है इतना वो मेरी नादान परी

Rohit tewatia 'Ishq'

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“मेरा ये मन उदास है” किसी की याद आई है मेरा ये मन उदास है ख़लिश सी दिल पे छाई है मेरा ये मन उदास है ये ज़िंदगी की बात है ये इश्क़ ही की बात है कि भूल कर भी मैं जिसे कभी नहीं भुला सका कभी ख़ुशी से मैं जिसे गले नहीं लगा सका मैं उस सेे जितना दूर हूँ वो उतना मेरे पास है मेरा ये मन उदास है कोई जो जंग हो कभी किसी के संग हो कभी उसी को देखता हूँ मैं उसी को सोचता हूँ मैं ना हारने का ग़म है फिर ना जीतने की आस है मेरा ये मन उदास है

Rohit tewatia 'Ishq'

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"लव ट्राईऐंगल" जब ख़यालों में मैं उस के पीछे पीछे जाता भाव खाती देखो फिर मैं उस सेे रुठ जाता ऐसे वैसे कैसे कैसे मुझ को वो मनाती जान थी मेरी वो कैसे मैं ना मान पाता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता तू सवाल और तेरा मैं जवाब होता काश जो तू मेरी आँखों में वो झाँक जाती तेरे पास में जो महका मैं गुलाब होता अगर ये ख़्वाब सच हुआ तो सुनले ऐ हसीं मैं पूरी उम्र तेरे दिल में ही गुज़ार दूँ तू जो चले तो दिन हो जब रूके तो रात हो ये काएनात तेरे क़दमों में उतार दूँ अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता काश जो तू बोले तेरी मैं आवाज़ होता तू शबाब तेरी धुन में मैं शराब होता सबके चेहरों को तो तू यूँँ निहार जाती तेरे नैनों का कभी तो मैं शिकार होता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता

Rohit tewatia 'Ishq'

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‘’निगाह’’ किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी अक्स मेरा मिलेगा जिस जगह देखोगी जान मोहब्बत फ़िज़ूल नहीं बस थोड़ा सब्र करो नाग़वार गुज़रे इश्क़ की पनाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर मसअला कुछ इनकार का ज़रूर रहा होगा जिस सेे ख़ुद बे-ख़बर हूँ वो मेरा क़ुसूर रहा होगा फिर इल्ज़ाम सारे बेबुनियाद से आएँगे आगे मेरे ख़िलाफ़ ना एक मिलेगा जो गवाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर तेरा छोड़ के जाना मोहब्बत की तौहीन था मेरा क्या? मेरा दिल तो टूटने का शौक़ीन था अभी एक दुआ क़ुबूल होनी आम बात समझती हो फिर कोई मंदिर और सालो साल कोई दरग़ाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी

Rohit tewatia 'Ishq'

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