"लव ट्राईऐंगल" जब ख़यालों में मैं उस के पीछे पीछे जाता भाव खाती देखो फिर मैं उस सेे रुठ जाता ऐसे वैसे कैसे कैसे मुझ को वो मनाती जान थी मेरी वो कैसे मैं ना मान पाता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता तू सवाल और तेरा मैं जवाब होता काश जो तू मेरी आँखों में वो झाँक जाती तेरे पास में जो महका मैं गुलाब होता अगर ये ख़्वाब सच हुआ तो सुनले ऐ हसीं मैं पूरी उम्र तेरे दिल में ही गुज़ार दूँ तू जो चले तो दिन हो जब रूके तो रात हो ये काएनात तेरे क़दमों में उतार दूँ अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता काश जो तू बोले तेरी मैं आवाज़ होता तू शबाब तेरी धुन में मैं शराब होता सबके चेहरों को तो तू यूँँ निहार जाती तेरे नैनों का कभी तो मैं शिकार होता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे
Rohit tewatia 'Ishq'
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"नादान परी" वो मेरी नादान परी सब सेे छिपकर रहती थी अक्सर मुझ सेे कहती थी छोड़ो प्यार व्यार की बातें हिस्से आती तन्हा रातें इस सेे क्या ही मिल पाएगा जो है वो भी ख़ो जाएगा मैं ने सोचा सच ही तो है प्यार किसे ही मिल पाया है इस को तो एहसास दिला दूँ दुनिया से भी मैं लड़ लूँगा क़िस्मत से कैसे जीतूँगा मैं तो ये ग़म पाल ही लूँगा टूटा दिल सँभाल ही लूँगा वो तो सचमुच मर जाएगी और फिर कुछ ना कर पाएगी उस को एक जीवन जीना है मुझ को हर आँसू पीना है वैसे भी क्या ही है मुझ में मेरे जैसे कितने होंगे मेरे होने से क्या होगा बस इक गिनती बढ़ जाएगी उस के आगे अड़ जाएगी मेरा जाना ही बेहतर है साँस ही लेनी है ले लूँगा जान ही देनी है दे दूँगा जान तो वैसे भी उस की है उस को कहाँ मालूम है इतना वो मेरी नादान परी
Rohit tewatia 'Ishq'
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"क़िस्मत" कभी सोचता हूँ मेरा हक़ है उस पर वही जो किसी और की हो चुकी है वो लड़की जो क़िस्मत में मेरे लिखी थी लकीरों से मेरी कहीं खो चुकी है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ मगर अब करूँँ तो करूँँ क्या भला मैं निगाहों में उस का ही चेहरा बसा है उसी को ये दिल मानता अब ख़ुदा है ये दिल अब धड़कता ही उस के लिए है ये पागल तड़पता ही उस के लिए है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ मैं कितना अभागा हूँ कह भी न पाया पनाहों में अपनी छिपा लो ना मुझ को मेरी बेख़ुदी से बचा लो ना मुझ को मुझे चैन पड़ता नहीं बिन तुम्हारे घड़ी भर गले से लगा लो ना मुझ को सुनो तुम सेे इक राज़ की बात कह दूँ ये चाहत बनी ही हमारे लिए थी मोहब्बत बनी ही हमारे लिए थी नहीं मैं ये हरगिज़ नहीं मान सकता कोई मुझ सेे ज़्यादा तुम्हें चाहता है ये वो सच है जिस का तुम्हें भी पता है मेरे जैसा कोई दिवाना नहीं है मगर तुम को दिल ही लगाना नहीं है कभी सोचता हूँ जो मेरी नहीं हो तो जिस की हो उस सेे चुरा लू मैं तुम को कभी सोचता हूँ कि ग़ज़लों में अपनी पिरो कर ज़रा गुनगुना लूँ मैं तुम को मगर जैसे क़िस्मत बदल सी गई है कि जैसे हर इक शख़्स ने बस हमें दूर करने की साज़िश रची है ग़लत हो रहा है अगर ये सही है कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ
Rohit tewatia 'Ishq'
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‘’निगाह’’ किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी अक्स मेरा मिलेगा जिस जगह देखोगी जान मोहब्बत फ़िज़ूल नहीं बस थोड़ा सब्र करो नाग़वार गुज़रे इश्क़ की पनाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर मसअला कुछ इनकार का ज़रूर रहा होगा जिस सेे ख़ुद बे-ख़बर हूँ वो मेरा क़ुसूर रहा होगा फिर इल्ज़ाम सारे बेबुनियाद से आएँगे आगे मेरे ख़िलाफ़ ना एक मिलेगा जो गवाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर तेरा छोड़ के जाना मोहब्बत की तौहीन था मेरा क्या? मेरा दिल तो टूटने का शौक़ीन था अभी एक दुआ क़ुबूल होनी आम बात समझती हो फिर कोई मंदिर और सालो साल कोई दरग़ाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी
Rohit tewatia 'Ishq'
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“मेरा ये मन उदास है” किसी की याद आई है मेरा ये मन उदास है ख़लिश सी दिल पे छाई है मेरा ये मन उदास है ये ज़िंदगी की बात है ये इश्क़ ही की बात है कि भूल कर भी मैं जिसे कभी नहीं भुला सका कभी ख़ुशी से मैं जिसे गले नहीं लगा सका मैं उस सेे जितना दूर हूँ वो उतना मेरे पास है मेरा ये मन उदास है कोई जो जंग हो कभी किसी के संग हो कभी उसी को देखता हूँ मैं उसी को सोचता हूँ मैं ना हारने का ग़म है फिर ना जीतने की आस है मेरा ये मन उदास है
Rohit tewatia 'Ishq'
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