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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ

ZafarAli Memon

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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है

ZafarAli Memon

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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र

ZafarAli Memon

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"कोई नहीं समझता" कोई बात नहीं समझता कोई जज़्बात नहीं समझता कोई समझ लेता है ख़्वाबों को पर कोई रात नहीं समझता कोई दूरी निभाना जानता है पर कोई साथ नहीं समझता कोई बग़ैर देखे चुन लेता है साथी पर कोई ज़ात-पात नहीं समझता कोई जान लेता है झूठी हँसी पर कोई हालात नहीं समझता कोई बात नहीं समझता तो कोई जज़्बात नहीं समझता

ZafarAli Memon

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"पहला इश्क़" तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है बातें होती थी बहुत ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है अंकों में दिलचस्पी मुझे उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत लेकिन शून्य सा अभिमान था पसंद उन की आँखों में काजल और उन पर वो चश्मा था उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी और आँखों में सुरमा था कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी लेकिन महरम बनाने की मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी पर ज़फ़र डरता खोने से उन को और कहा जैसी रब की मर्ज़ी न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद तो फिर क्यूँँ हम दोनों को मिलाया

ZafarAli Memon

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