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वो शख़्स बहुत ज़हीन था मेरे लिए जैसे एक ख़्वाब था मैं जिस दुनिया में एक छोटा सा जुगनू था वो उस दुनिया का आफ़ताब था

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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“अमलतास” याद है अमलतास का वो पेड़ जो तुम को मैं दिखाया करता था जिस के पीले फूल बहुत पसंद आए थे तुम्हें. वो गुलमोहर जिस के नीचे बैठ कर एक शाम तुम ने खोल डाले थे दिल के सब राज़ मेरे सामने. वो बेंच जिस पर बैठ कर हम ने आख़िरी सेल्फ़ी ली थी. वो बेंच, वो गुलमोहर, वो अमलतास सब आज भी वहीं है. तुम्हारा शहर अब बहुत दूर हो गया है. लौट कर आ सकता था तुम्हारे शहर मगर (जैसे गुलज़ार साहब कहते हैं) रास्ते में दरिया पड़ते हैं और पुल सारे तुम ने जला दिए थे.

KAPIL DEV

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मुझे हर रास्ते की ख़बर थी कि कौन सा रस्ता किधर जाता है तुम्हें रास्ते कभी याद नहीं रहते थे शायद यही वजह थी कि तुम मंज़िल तक पहुंच गईं मैं रास्तों में भटकता रहा।

KAPIL DEV

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सुब्ह की पेशानी पर किया गया दस्तख़त है कोहरा, जनवरी की किताब में ना जाने कितने दस्तख़त किए हैं सर्दी ने। तुम्हारे ख़यालों की धूप ओढ़कर मैं जनवरी की ये सर्द किताब पढ़ता हूँ।

KAPIL DEV

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तुम्हारी रूह को छूने की तमन्ना है मुझे तुम्हारे जिस्म की सरहद से पार जाना है तुम्हारी आँख के आँसुओं से आँख अपनी भिगोनी है तुम्हारे दर्द को अपने दिल पे पहनना है मुझे अपनी ख़ुशी तुम्हारे कान की बालियों में पिरोनी है तुम्हारी हँसी के गहरे समुंदरों में डूबना है उदासी के हर पैरहन को उतार जाना है। तुम्हारी रूह को छूने की तमन्ना है मुझे तुम्हारे जिस्म की सरहद से पार जाना है

KAPIL DEV

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‘मेरी तुम’ जब कभी, कहीं भी फूल देखता हूँ मुझे, तुम याद आती हो

KAPIL DEV

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