औरत जब तक पर्दे में रहती है उसे क़दम-क़दम पर मर्द के सहारे की ज़रूरत महसूस होती है लेकिन जब वह पर्दे से बाहर आती है तो मर्द इसके लिए बे-मसरफ़ चीज़ बन कर रह जाता है। (अफ़साना: नथ उतराई)
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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ज़िंदगी का हर वरक़ बा-शौक़ पढ़िए ये किताब इक रोज़ लौटानी भी तो है
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ये ज़िन्दगी की दौड़ दौड़कर मिला ही क्या हमें न जीता शख़्स घर जा पाता है न हारा शख़्स ही
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उम्मीद तो थी कि दिन बदलेंगे अपने कभी दिन ऐसे बदले कि अब उम्मीद तक भी नहीं
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उदासी भी तो इक व्रत ही है वो भी ऐसा व्रत कि हँस लेने से भी जो टूटने वाला नहीं
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ज़िंदगी भर यूँँ मेरे दिल को दुखाया था बहुत क़ब्र पर आया है वो मुझ से मुआ'फ़ी के लिए
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