आज उस से बिछड़ के हम ने 'प्रीत' कितना नज़दीक पाया है उस को
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आज का दिन भी ऐश से गुज़रा सर से पाँव तक बदन सलामत है
Jaun Elia
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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मैं ज़िन्दगी में आज पहली बार घर नहीं गया मगर तमाम रात दिल से माँ का डर नहीं गया बस एक दुख जो मेरे दिल से उम्र भर न जाएगा उस को किसी के साथ देख कर मैं मर नहीं गया
Tehzeeb Hafi
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दिल ऐसा कि सीधे किए जूते भी बड़ों के ज़िद इतनी कि ख़ुद ताज उठा कर नहीं पहना
Munawwar Rana
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा
Fahmi Badayuni
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थोड़ा उलझे मसाइल-ए-दिल में कुछ परेशाँ दिमाग़ ने किया था रात से जंग जीत जाते मगर ये अँधेरा चराग़ ने किया था
Prit
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उसे हर वक़्त करता हूँ महसूस वो जिसे आज तक छुआ ही नहीं
Prit
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मरे भी तो तड़प तड़प के मरे ज़िंदगी भी हलाल में गुज़री
Prit
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जिस्म छलनी हो चुका है रूह घाइल हो चुकी है प्यार में कान्हा के मीरा कितनी पागल हो चुकी है तेरे दर्शन की तमन्ना में निकल आई है घर से ज़हर पी कर प्रेम बरसाए वो बादल हो चुकी है
Prit
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आप कुछ ज़्यादा अपने आप से हैं वरना मुझ में तो कोई भी कमी नइँ
Prit
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