जिस्म छलनी हो चुका है रूह घाइल हो चुकी है प्यार में कान्हा के मीरा कितनी पागल हो चुकी है तेरे दर्शन की तमन्ना में निकल आई है घर से ज़हर पी कर प्रेम बरसाए वो बादल हो चुकी है
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मिले किसी से गिरे जिस भी जाल पर मेरे दोस्त मैं उस को छोड़ चुका उस के हाल पर मेरे दोस्त ज़मीं पे सबका मुक़द्दर तो मेरे जैसा नहीं किसी के साथ तो होगा वो कॉल पर मेरे दोस्त
Ali Zaryoun
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बात ही कब किसी की मानी है अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी ये कलाई ये जिस्म और ये कमर तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी
Jaun Elia
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मैं उस से बात करने जा चुका था मगर वो शख़्स आगे जा चुका था पढ़ाई ख़त्म कर के जब मैं लौटा कोई अफ़सर उसे ले जा चुका था
Tousief Tabish
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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है
Mirza Ghalib
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ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है
Abbas Tabish
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उसे हर वक़्त करता हूँ महसूस वो जिसे आज तक छुआ ही नहीं
Prit
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'प्रीत' जिस तिस बहाने कर भी ले एक तितली से बात फूलों की
Prit
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पास थे हम मगर कुछ ऐसे थे जनवरी थी वो मैं दिसंबर था
Prit
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आज उस से बिछड़ के हम ने 'प्रीत' कितना नज़दीक पाया है उस को
Prit
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बात अच्छी लगी तो आऊँगा वरना मेरे बदन से बात करें
Prit
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