'प्रीत' जिस तिस बहाने कर भी ले एक तितली से बात फूलों की
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वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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बिठा दिया है सिपाही के दिल में डर उस ने तलाशी दी है दुपट्टा उतार कर उस ने मैं इस लिए भी उसे ख़ुद-कुशी से रोकता हूँ लिखा हुआ है मेरा नाम जिस्म पर उस ने
Zia Mazkoor
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नौकरी पा के लौटा मैं जब घर देखा तो उस की शादी हो चुकी थी
Prit
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यूँँ भी नाकाम किया ज़िंदगी को उम्र भर काम ही करते रहे हम
Prit
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बात अच्छी लगी तो आऊँगा वरना मेरे बदन से बात करें
Prit
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तुम ने आदत बदलनी थी अपनी आदतन ख़ुद नहीं बदलना था
Prit
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पूरे होश-ओ-हवा से में हूँ और इक अजब क़ैफियत भी तारी है ऐ कज़ा ज़िंदा छोड़ना उन को जिन को जीने में मौत आ रही है
Prit
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