आँखों से तेरे ख़्वाब के मंज़र निकाल के हम सर्दियों में बैठे हैं चादर निकाल के जब तू ही देखने को मुयस्सर नहीं हमें आँखों को रख न दें कहीं बाहर निकाल के
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
Tehzeeb Hafi
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हम ने उस को इतना देखा जितना देखा जा सकता था लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था
Farrukh Yar
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मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंट रख देना यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है
Bashir Badr
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तू वापस लौट कर आए न आए ये दरिया हर समय बहता मिलेगा
Shahzan Khan Shahzan'
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रहना पड़ता है उदासी के नगर में हम को तब कहीं जाके ये अश'आर हुआ करते हैं
Shahzan Khan Shahzan'
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ज़रा सा मुस्कुराओ रौशनी हो बहुत तंग आ गए हम तीरगी से
Shahzan Khan Shahzan'
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वो चाह कर भी तो रातों को सो नहीं पाते सज़ा मिली है चराग़ों को इश्क़ करने की
Shahzan Khan Shahzan'
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आँखों से तेरे ख़्वाब के मंज़र निकाल के हम सर्दियों में बैठे हैं चादर निकाल के जब तू ही देखने को मुयस्सर नहीं हमें आँखों को रख न दें कहीं बाहर निकाल के
Shahzan Khan Shahzan'
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