अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे ख़्वाब हो जाओगे अफ़्सानों में ढल जाओगे हम-सफ़र ढूँडो न रहबर का सहारा चाहो ठोकरें खाओगे तो ख़ुद ही सँभल जाओगे
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
Sahir Ludhianvi
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है
Deepti Mishra
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हमें अपने घर से चले हुए सर-ए-राह उम्र गुज़र गई कोई जुस्तुजू का सिला मिला न सफ़र का हक़ ही अदा हुआ
Iqbal Azeem
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क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आस्तीं उस को ख़बर नहीं कि लहू बोलता भी है
Iqbal Azeem
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अब हम भी सोचते हैं कि बाज़ार गर्म है अपना ज़मीर बेच के दुनिया ख़रीद लें
Iqbal Azeem
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आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे
Iqbal Azeem
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अपनी मिट्टी ही पे चलने का सलीक़ा सीखो संग-ए-मरमर पे चलोगे तो फिसल जाओगे
Iqbal Azeem
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