चार मिसरे जो उस्ताद ने थे दिए पढ़ के उस्ताद ख़ुद को बताने लगे
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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उदासी का सबब दो चार ग़म होते तो कह देता फ़ुलाँ को भूल बैठा हूँ फ़ुलाँ की याद आती है
Ashu Mishra
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किस लिए देखती हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो
Jaun Elia
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पर्वतों को ज़ख़्म गहरे दे दिए हैं पानियों से पत्थरों पर वार कर के
nakul kumar
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वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
Mirza Ghalib
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जीवन को गुलज़ार करें क्या क्या कहती हो प्यार करें क्या तुम को चूमा ग़लती कर दी ग़लती फिर इक बार करें क्या
Alankrat Srivastava
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हमें पूछो कठिन कितना किसी का दिल चुराना है उन्हें क्या है उन्हें तो बस ज़रा का मुस्कुराना है
Alankrat Srivastava
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कौन कहता है ये दूर मुझ सेे हो तुम तुम सेे रौशन हूँ मैं नूर मुझ सेे हो तुम
Alankrat Srivastava
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हर घड़ी हर पहर तुम मेरे पास हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो
Alankrat Srivastava
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तुम्हारी ही मोहब्बत ने सिखाया ये हुनर वरना बहुत जी जान से पढ़ कर फ़क़त इंजीनियर होते
Alankrat Srivastava
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