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पर्वतों को ज़ख़्म गहरे दे दिए हैं पानियों से पत्थरों पर वार कर के

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हर बार मुझे हर साँस मिरी इक बात यही समझाती है कुछ काम करो कुछ नाम करो ये उम्र निकलती जाती है मैं कहता हूँ कि समझो तो कोई बात नहीं ऐसी लेकिन इस दुनिया में शोहरत की हवस मुझे अंदर से खा जाती है

nakul kumar

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ये दिन महीने साल ये रातों का क्या करुँ चुभने लगी हैं अब तिरी बातों का क्या करुँ ये रात हैं जो सात ये मुश्किल से हैं कटीं ये दिन भी तो हैं सात ही सातों का क्या करुँ

nakul kumar

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कौन तेरे घर की दीवारें चौखट चूमेगा कौन तेरी आँखों में अपनी आँखें रोपेगा

nakul kumar

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माचिस की तीली की मुआफ़िक़ सर पे आग लिए फिरता हूँ आग लगानी है दुनिया को इतना हूँ बेताब समझ लो

nakul kumar

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सोच कर ये मन की मन में मार देते हैं सभी ख़ास बातें हर किसी से तो कही जाती नहीं

nakul kumar

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