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देना ही है जो कुछ तो उसे ज़ख़्म दीजिये एहसान भूल जाएगा कम्बख़्त आदमी

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वो तेरा नींद में हँसना भी इक क़यामत है कभी तो ख़्वाब में हम को भी तू बुलाया कर

Dharamraj deshraj

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समय हाथों से निकला जा रहा है परिंदा वक़्त का समझा रहा है मुसाफ़िर की तरह हम सब यहाँ हैं कोई आया तो कोई जा रहा है अभी भी वक़्त है यारो सँभलिए समय अब आईना दिखला रहा है जहाँ इंसान भी गायब मिलेगा अभी बस वो ज़माना आ रहा है जरा सोचो कि ईमाँ जब न होगा अभी तो आदमी इतरा रहा है सलीक़े से हमें रहना ही होगा भले मौसम हमें भटका रहा है 'धरम' अब तो बुराई छोड़ भी दे जो दानिशमंद है समझा रहा है

Dharamraj deshraj

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ज़िन्दगी का नहीं था जब मक़सद मौत का इंतिज़ार था मुझ को

Dharamraj deshraj

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ज़िन्दगी तू आज़माना छोड़ दे मौत से कह दे बहाना छोड़ दे फूँकने के काम वो आता मकाँ जब परिंदा आशियाना छोड़ दे यार क़िस्मत से भी भागा है कोई बे-सबब आँसू बहाना छोड़ दे छोड़ दूँ उस की गली उस का नगर वो मिरे ख़्वाबों में आना छोड़ दे यार तू माता-पिता को रब समझ हर कहीं भी सर झुकाना छोड़ दे फूल के बदले जहाँ काँटे मिलें ऐसे तू रिश्ते निभाना छोड़ दे चाँद पाने के लिए नादाँ 'धरम' हो सके तो कसमसाना छोड़ दे

Dharamraj deshraj

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मेरा मासूम बचपन था भूखा बहुत लोरियां माँ सुनाती रही रात भर

Dharamraj deshraj

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