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दिल के दरवाज़े भेड़ कर देखो जख़्म सारे उधेड़ कर देखो बंद कमरे में आईने से कभी तुम मेरा जिक्र छेड़ कर देखो

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गुल सा तू तेरा साथ ख़ुशबू सा हाथ में तेरा हाथ ख़ुशबू सा हो के तुझ से जुदा भटकता हूँ गुल से बिछड़ी अनाथ ख़ुशबू सा

Sandeep Thakur

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इस नदी की जवानी गिरवी है क्या बहेगी रवानी गिरवी है डूबी है बूँद-बूँद कर्ज़े में बाँध में सारा पानी गिरवी है

Sandeep Thakur

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आ के नज़दीक मुँह न फेर ग़ज़ल पास आ बैठ थोड़ी देर ग़ज़ल सब तेरे नूर से चमकते हैं लफ़्ज़ मिसरे ख़याल शे'र ग़ज़ल

Sandeep Thakur

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मुझ से दो दिन अलग रही है तू देख तो कैसी लग रही है तू हो गया राख जल के मैं लेकिन धीरे-धीरे सुलग रही है तू

Sandeep Thakur

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पहले ख़ुद को एक अच्छी जाॅब के क़ाबिल करूँँ घर ख़रीदूँ कार लूँ फिर पेश तुझ को दिल करूँँ तू कोई एग्ज़ाम है क्या पास करना है तुझे तू कोई डिग्री है क्या पढ़ कर तुझे हासिल करूँँ

Sandeep Thakur

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