ek baras aur bit gaya kab tak khak udani hai
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
Azm Shakri
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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मुद्दतों बा'द इक शख़्स से मिलने के लिए आइना देखा गया, बाल सँवारे गए
Jaun Elia
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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मेरी कोशिश तो यही है कि ये मासूम रहे और दिल है कि समझदार हुआ जाता है
Vikas Sharma Raaz
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एक बरस और बीत गया कब तक ख़ाक उड़ानी है
Vikas Sharma Raaz
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अभी तो शाम की दस्तक हुई है अभी से लग गया बिस्तर हमारा यही तन्हाई है जन्नत हमारी इसी जन्नत में है अब घर हमारा
Vikas Sharma Raaz
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इरादा तो नहीं है ख़ुद-कुशी का मगर मैं ज़िंदगी से ख़ुश नहीं हूँ
Vikas Sharma Raaz
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