इक शख़्स है काफ़ी हमारा दिल दुखाने के लिए 'सलमा' हमें सारे ज़माने की ज़रूरत ही नहीं
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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इसीलिए तो मैं रोया नहीं बिछड़ते समय तुझे रवाना किया है जुदा नहीं किया है
Ali Zaryoun
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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यही वो वक़्त है जो आज हम बर्बाद करते हैं यही वो वक़्त है जो लौट कर वापस नहीं आता
Salma Malik
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ज़ीस्त की थी जुस्तुजू अब भला हम क्या करें मौत का व्यापार था अब जिएँ या हम मरें सम्त सारी हैं कड़ी मुश्किलें 'सलमा' बड़ी मौत है अब आरज़ू ज़ीस्त का फिर क्या करें
Salma Malik
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तुम लड़के तो इश्क़ में पागल भी हो सकते हों हम लड़की तो इतनी ख़ुश-क़िस्मत भी नईं होती
Salma Malik
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मैं भी अपनी माँ के जैसे अपनी बेटी को चाहूँ मैं ने रब से चाहा भी यही है कि मुझे इक बेटी हो
Salma Malik
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ये ज़िन्दगी जीने को बस ज़िंदादिली सलमा ज़रूरी है ये बे-दिली तो आदमी को बे-दिली से मार देती है
Salma Malik
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