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गीत लिक्खे भी तो ऐसे के सुनाएँ न गए ज़ख़्म यूँँ लफ़्ज़ों में उतरे के दिखाएँ न ग‌ए आज तक रक्खे हैं पछतावे की अलमारी में एक दो वादे जो दोनों से निभाएँ न गए

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ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है

Farhat Abbas Shah

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बस एक लम्हे के सच झूट के एवज़ 'फ़रहत' तमाम उम्र का इल्ज़ाम ले गया मुझ से

Farhat Abbas Shah

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है किसी जालिम उदू की घात दरवाज़े में है या मसाफ़त है नई या रात दरवाज़े में है जिस तरहा उठती है नजरें बे-इरादा बार-बार साफ़ लगता है के कोई बात दरवाज़े में

Farhat Abbas Shah

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हर रोज़ उठाता हूँ किसी ख़्वाब की मय्यत और आप ये कहते हैं कि मातम न करूँँ मैं इक शख़्स दिखा दो मुझे हँसता हुआ दिल से गोया कि ये सब देख के भी ग़म न करूँँ मैं

Farhat Abbas Shah

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ये दिल मलूल भी कम है उदास भी कम है कई दिनों से कोई आस पास भी कम है हमें भी यूँ ही गुजरना पसंद है और फिर तुम्हारा शहर मुसाफ़िर-शनास भी कम है

Farhat Abbas Shah

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