baaz-auqaat ghareeb ko moochh isliye rakhni padti hai ki waqt-e-zaroorat neeche kar ke jaan ki amaan paaye.
Related Sher
सभी के साथ दिखना भी मगर सब सेे जुदा रहना भी है उस को उदासी साथ भी रखनी है और तस्वीर में हँसना भी है उस को
Kafeel Rana
61 likes
दवाओं की रसीदें देख ली थीं किताबें इस लिए माँगी नहीं हैं
Tanoj Dadhich
49 likes
अपने हाकिम की फ़कीरी पे तरस आता है जो ग़रीबों से पसीने की कमाई माँगे
Rahat Indori
57 likes
ग़म में हम सूरत-ए-गमख़ार नहीं पढ़ते हैं इस लिए मीर के अश'आर नहीं पढ़ते हैं मेरी आँखें तेरी तस्वीर से जा लगती हैं सुब्ह उठकर सभी अख़बार नहीं पढ़ते हैं
Ashu Mishra
31 likes
इस लिए नहीं रोया अश'आर में वज़्न से बाहर थी मेरी सिसकियाँ
Saad Ahmad
31 likes
More from Mushtaq Ahmad Yusufi
ज़ीस्त में मेरे उस ने अँधेरा किया और उस को सभी 'रौशनी' कहते थे
0 likes
वो मुंसिफ़ है मेरा जो क़ातिल है जाँ का मेरे हक़ में वो फ़ैसला क्या करेगा
0 likes
ज़रा तुम अपनी हद में रहने की कोशिश करो वरना तुम्हारे ऐब से इक दिन तुम्हें बदनाम कर देंगे
0 likes
सिखाया है तुम्हीं ने इश्क़ करना मुझ को शिद्दत से मुहब्बत में तुम्हारा ज़िक्र लाज़िम है मेरी जानाँ
0 likes
सिर्फ़ इस लिए ही लिखता हूँ उसे मैं रोज़ ख़त ताकि उस में बे-झिझक "तुम्हारा अपना" लिख सकूँ
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Mushtaq Ahmad Yusufi.
Similar Moods
More moods that pair well with Mushtaq Ahmad Yusufi's sher.







