ग़ज़ल किताब तसव्वुर ख़िज़ाँ अकेलापन मिरे नसीब में कितनी अजीब चीज़ें हैं
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
Nida Fazli
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हम इक ही लौ में जलाते रहे ग़ज़ल अपनी नई हवा से बचाते रहे ग़ज़ल अपनी दरअस्ल उस को फ़क़त चाय ख़त्म करनी थी हम उस के कप को सुनाते रहे ग़ज़ल अपनी
Zubair Ali Tabish
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लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है
Munawwar Rana
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ये मुहब्बत की किताबें कौन यूँँ कब तक पढ़े कौन मारे रोज़ ही इक बात पे अपना ही मन
nakul kumar
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वफ़ा थी इश्क़ था मासूमियत थी तुम्हारे बा'द सब कुछ मर गया है
Praveen Sharma SHAJAR
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ये वो धूप है जिस से दिल को सिर्फ़ भिगोया जा सकता है ये वो नशेमन जिस में केवल ग़म को संजोया जा सकता है जॉन की ग़ज़लें पढ़ने लगे हो तो फिर इतना ध्यान में रखना जॉन की ग़ज़लें पढ़ लेने पर केवल रोया जा सकता है
Praveen Sharma SHAJAR
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उस के बिन तुम रह सकते हो समझो मत ख़ुद को शाइ'र कह सकते हो समझो मत सब को अपना समझा तब ये समझा है सब को अपना कह सकते हो समझो मत
Praveen Sharma SHAJAR
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तेरे ख़िलाफ़ अगर जंग में उतारा गया तो साफ़-साफ़ समझ ले कि मैं तो मारा गया वो जब गया था तो कुछ भी नहीं गया था मेरा जब उस की याद गई है तो हर सहारा गया
Praveen Sharma SHAJAR
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रास आए न मुहब्बत तो भला क्या कीजे अब जो होता ही नहीं पास-ए-वफ़ा क्या कीजे उन को हाकिम की ज़रूरत जो अभी ज़िंदा हैं मुझ सी जलती हुई लाशों की दवा क्या कीजे
Praveen Sharma SHAJAR
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