हम से क्या हो सका मोहब्बत में ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की वक्ता स्वीकार करता है कि प्रेम निभाने में उससे कमी रह गई और वह असमर्थ रहा। दूसरे पंक्ति में ‘चलो’ का ताना है: वक्ता भले कुछ न कर सका, पर सामने वाले ने एक काम पक्का किया—विश्वास तोड़ना। यही विरोध भावनात्मक चोट, शिकायत और कड़वे व्यंग्य को गहरा करता है।
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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क्यूँँ इंतिहा-ए-होश को कहते हैं बे-ख़ुदी ख़ुर्शीद ही की आख़िरी मंज़िल तो रात है
Firaq Gorakhpuri
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बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई
Firaq Gorakhpuri
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तू याद आया तेरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए मोहब्बत में ये मा'सूमी बड़ी मुश्किल से आती है
Firaq Gorakhpuri
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ये न पूछ कितना जिया हूँ मैं ये न पूछ कैसे जिया हूँ मैं कि अबद की आँख भी लग गई मेरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में
Firaq Gorakhpuri
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इसी खंडर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात
Firaq Gorakhpuri
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