क्यूँँ इंतिहा-ए-होश को कहते हैं बे-ख़ुदी ख़ुर्शीद ही की आख़िरी मंज़िल तो रात है
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Firaq Gorakhpuri
@firaq-gorakhpuri
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Ghazal
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Nazm
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sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई
sherKuch Alfaaz
बर्क़-ए-फ़ना भी खाए जहाँ ठोकरें 'फ़िराक़' राह-ए-वफ़ा में आते हैं ऐसे मक़ाम भी
sherKuch Alfaaz
हर फ़रेब-ए-ग़म-ए-दुनिया से ख़बरदार तो है तेरा दीवाना किसी काम में हुशियार तो है
sherKuch Alfaaz
ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त सोच लें और उदास हो जाएँ
sherKuch Alfaaz
मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर
sherKuch Alfaaz
ये न पूछ कितना जिया हूँ मैं ये न पूछ कैसे जिया हूँ मैं कि अबद की आँख भी लग गई मेरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में
sherKuch Alfaaz
तू याद आया तेरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए मोहब्बत में ये मा'सूमी बड़ी मुश्किल से आती है
sherKuch Alfaaz
ख़ैर सच तो है सच मगर ऐ झूठ मैं ने तेरा भी ए'तिबार किया
sherKuch Alfaaz
देवताओं का ख़ुदा से होगा काम आदमी को आदमी दरकार है
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