हमारी ग़ज़ल बहर में है हवा की चली लहर में है किसी ने हमें ये ख़बर दी यहीं वो इसी शहर में है
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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ये मत पूछो कि उस में और क्या-क्या देखता हूँ उसी इक शख़्स में मैं अपनी दुनिया देखता हूँ कभी आँखें कभी चेहरा कभी लब तो कभी तिल कि दिल भरता नहीं मैं उस को जितना देखता हूँ
Shubham Vaishnav
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फिर शुरू तर्क-ए-त'अल्लुक़ की कहानी मत करो बात ये है बात अब कुछ भी पुरानी मत करो
Shubham Vaishnav
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मैं लुटाया इतना ख़ुद को अब बुरा लगता नहीं जाने कोई शख़्स मुझ को क्यूँँ मिरा लगता नहीं
Shubham Vaishnav
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अब तो अच्छी चल रही है ज़िंदगी थोड़ी बहुत हम को भी आने लगी है शा'इरी थोड़ी बहुत
Shubham Vaishnav
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सभी की नज़र ही उधर है उसे भी नहीं ये ख़बर है अभी तो मिला है मुझे वो उसी पर सभी की नज़र है
Shubham Vaishnav
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