हवा से परे था पता जब दिए का तो कैसे बुझा था दिया मुख़बिरी पर बता तो दिया है कि ये ये कमी है सुकूँ से करो तब्सिरा अब कमी पर
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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तुझे कैसे इल्म न हो सका बड़ी दूर तक ये ख़बर गई तिरे शहर ही की ये शाएरा तिरे इंतिज़ार में मर गई
Mumtaz Naseem
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परेशाँ है वो झूटा इश्क़ कर के वफ़ा करने की नौबत आ गई है
Fahmi Badayuni
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जाने क्या कुछ कर बैठा है बहुत दिनों से घर बैठा है वो मधुमास लिखे भी कैसे शाखों पर पतझर बैठा है
Vigyan Vrat
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करती है तो करने दे हवाओं को शरारत मौसम का तकाज़ा है कि बालों को खुला छोड़
Abrar Kashif
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वहाँ पे जाके क़दम डगमगाने लगते हैं इसी लिए तो बुलंदी पे मैं नहीं जाता
Abdulla Asif
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ज़िन्दगी मेरी नज़रों से तू गिर चुकी और मैं भी गिरी चीज़ रखता नहीं
Abdulla Asif
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ख़ता ऐसी भी क्या कर दी जहन्नम ने जहन्नम को जहन्नम क्यूँ मिली आख़िर
Abdulla Asif
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तू नुक़्ताचीं ज़रा चखकर बता कि आख़िर ज़हर में क्या नुक़्स है
Abdulla Asif
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रो रो के कह रही है धनक धिन धनक धनक इक साज़ तेरे लम्स से जो आश्ना नहीं
Abdulla Asif
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