इक चुभन है कि जो बेचैन किए रहती है ऐसा लगता है कि कुछ टूट गया है मुझ में
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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है
Hastimal Hasti
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होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने शाइ'र तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
Mirza Ghalib
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ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
Bashir Badr
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सितारे और क़िस्मत देख कर घर से निकलते हैं जो बुज़दिल हैं मुहूरत देख कर घर से निकलते हैं हमें लेकिन सफ़र की मुश्किलों से डर नहीं लगता कि हम बच्चों की सूरत देख कर घर से निकलते हैं
Abrar Kashif
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हर लड़के में एक ख़राबी होती है उस को अपना इश्क़ इबादत लगता है
Saurabh Sharma 'sadaf'
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ये कैसे मलबे के नीचे दबा दिया गया हूँ मुझे बदन से निकालो मैं तंग आ गया हूँ
Irfan Sattar
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नहीं नहीं मैं बहुत ख़ुश रहा हूँ तेरे बग़ैर यक़ीन कर कि ये हालत अभी अभी हुई है
Irfan Sattar
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ख़ुशबू था मैं बिखरना मेरा इख़्तिसास था इन ज़िम्मेदारियों ने इकट्ठा किया मुझे
Irfan Sattar
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किसी आहट में आहट के सिवा कुछ भी नहीं अब किसी सूरत में सूरत के सिवा क्या रह गया है
Irfan Sattar
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उस की ख़्वाहिश पे तुम को भरोसा भी है उस के होने न होने का झगड़ा भी है लुत्फ़ आया तुम्हें गुमरही ने कहा गुमरही के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल
Irfan Sattar
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