इन्हीं रस्तों पे हम तुझ सेे मिले थे इन्हीं रस्तों पे तुझ को खो रहे हैं
Related Sher
क्या ख़बर कौन था वो, और मेरा क्या लगता था जिस सेे मिल कर मुझे, हर शख़्स बुरा लगता था
Tehzeeb Hafi
444 likes
मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
118 likes
कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
163 likes
मुझ सेे बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है उस लड़की ने मुझ सेे बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी
Jaun Elia
174 likes
इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
Bashir Badr
112 likes
More from Siddharth Saaz
तू बुझा कर रख गया था जबसे इस दिल के चराग़ हम ने इस घर में नहीं की रौशनाई आज तक
Siddharth Saaz
1 likes
हम लोग चूंकि दश्त के पाले हुए हैं सो ख़्वाबों में चाहे झील हों, आँखों में पेड़ हैं
Siddharth Saaz
2 likes
तमाम मस'अले उठाए फिर रहे हैं हम इसीलिए भी चलते चलते थक गए हैं हम थे कितने कम-नसीब हम कि राबता न था हैं कितने ख़ुशनसीब तुझ को छू रहे हैं हम
Siddharth Saaz
8 likes
तुम सेे बिछड़ के हम को यही लग रहा है अब जैसे मिटा दिया है ख़ुदा ने लिखा हुआ
Siddharth Saaz
5 likes
ग़ज़ल पूरी न हो चाहे, मग़र इतनी सी ख़्वाहिश है मुझे इक शे'र कहना है तेरे रुख़्सार की ख़ातिर
Siddharth Saaz
14 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Siddharth Saaz.
Similar Moods
More moods that pair well with Siddharth Saaz's sher.







