ग़ज़ल पूरी न हो चाहे, मग़र इतनी सी ख़्वाहिश है मुझे इक शे'र कहना है तेरे रुख़्सार की ख़ातिर
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है शोहरतें छीन के गुमनाम भी कर देता है वक़्त से आँख मिलाने की हिमाकत न करो वक़्त इंसान को नीलाम भी कर देता है
Nadeem Farrukh
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उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे वो मिरा होने से ज़्यादा मुझे पाना चाहे
Kumar Vishwas
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हर शे'र हर ग़ज़ल पे है ऐसी छाप तेरी तस्वीर बन रही है इक अपने आप तेरी तेरे लिए किसी को इतना दीवाना देखा लगने लगी है मुझ को चाहत भी पाप तेरी
Sandeep Thakur
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मुझ सेे मिलने ही आती है नुक्कड़ पर पानी पूरी केवल एक बहाना है
Divy Kamaldhwaj
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तू बुझा कर रख गया था जबसे इस दिल के चराग़ हम ने इस घर में नहीं की रौशनाई आज तक
Siddharth Saaz
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और आसान नहीं हो सकता फ़रियादों को पूरा करना एक ही आस लगा रक्खी है, ख़ुदा सभी बंदों ने तुझ सेे
Siddharth Saaz
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तन्हा कब तक बात करूँँगा मैं तू भी मुझ सेे बात किया कर दोस्त
Siddharth Saaz
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हम लोग चूंकि दश्त के पाले हुए हैं सो ख़्वाबों में चाहे झील हों, आँखों में पेड़ हैं
Siddharth Saaz
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ये ग़म हम को पत्थर कर देगा इक दिन कोई आ कर हमें रुलाओ पहले तो
Siddharth Saaz
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