इस जहाँ के लिए आँखों में कशिश है ही नहीं मैं किसी और ही मंज़िल का मुसाफ़िर निकला
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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कैसे महदूद हो दो मिसरों में एक मुफ़लिस की ज़िंदगी का दुख
रूपम कुमार 'मीत'
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दिल टूटने का ग़म भी न महसूस कर सके बेहिस बना दिया है ज़माने ने यूँँ हमें
रूपम कुमार 'मीत'
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ता-क़यामत अमर नहीं होता मैं सुख़नवर अगर नहीं होता
रूपम कुमार 'मीत'
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तीसरे दिन हमें मिली ये ख़बर ज़िंदगी चार दिन की होती है
रूपम कुमार 'मीत'
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तैर पाता नहीं था जो लड़का उस को फेंका गया है पानी में
रूपम कुमार 'मीत'
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