जाने कितने घटे-बढ़े होंगे मुद्दतें हो गईं सितारे गिने
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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क्या ग़लत-फ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं
Tehzeeb Hafi
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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कुछ न रह सका जहाँ विरानियाँ तो रह गईं तुम चले गए तो क्या कहानियाँ तो रह गईं
Khalil Ur Rehman Qamar
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घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
Tehzeeb Hafi
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हम ने चाहे थे अच्छे दिन तुम सेे तुम ने भी अच्छे दिन दिखाए हैं
Vikas Rana
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लो रख दी जान पलड़े पर तुम अपनी शा'इरी रक्खो
Vikas Rana
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मुझ को ये मालूम नहीं था तुम सेे मिलने से पहले दोस्त जल्दी आँखें भरने वालों के मन जल्दी भर जाते हैं
Vikas Rana
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कोई तितली पकड़ लें अगर फूल पर रख दिया कीजिए
Vikas Rana
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सोचता हूँ कि यूँँ न हो इक दिन ये ज़मीं कोई आसमाँ निकले
Vikas Rana
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