जब भी मारो तो मारो सुनसान जगह पर मुझ को सुन लेंगे कान यहाँ जो दीवारों के लगे हुए हैं
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तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे
Ahmad Faraz
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मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मेरे पाँव दबाने लग जाए
Mehshar Afridi
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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ये समझ में आ गया बेरोज़गारी के दिनों में पैसा है अपनी जगह और दोस्ती अपनी जगह पर
Saahir
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उस की दीवार पे तस्वीर बना रक्खी थी मैं ने ख़ुद पाँव की ज़ंजीर बना रक्खी थी लिखते रहने से मेरा ख़ून निकल आया था उस ने काग़ज़ पे भी शमशीर बना रक्खी थी
Saahir
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जैसे बादल किए जाते हैं चाँद के संग अठखेलियाँ उस सरकते हुए पल्लू में वो यूँँ चेहरा छिपाती रही
Saahir
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उस की अच्छी बुरी आदतें सारी मालूम हैं मुझ को साहिर चाँदनी संग मैं दाग़ भी मेरे महताब में देखता हूँ
Saahir
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बुत-ख़ानों में क्यूँ सब पैसे ले के खड़े हुए हैं भगवानों के घर तो पहले से ही भरे हुए हैं
Saahir
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