जिस्म से रूह ज्यूँ निकलती है बेटियाँ माँ के घर से जाती हैं
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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मैं समझा था तुम हो तो क्या और माँगू मेरी ज़िन्दगी में मेरी आस तुम हो ये दुनिया नहीं है मेरे पास तो क्या मेरा ये भरम था मेरे पास तुम हो
Khalil Ur Rehman Qamar
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अब इन जले हुए जिस्मों पे ख़ुद ही साया करो तुम्हें कहा था बता कर क़रीब आया करो मैं उस के बा'द महिनों उदास रहता हूँ मज़ाक में भी मुझे हाथ मत लगाया करो
Tehzeeb Hafi
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बन्दूक रखने की इजाज़त दीजिए सरकार अब इस घर में हैं कुछ बेटियाँ और शहर में ज़ालिम बहुत
nakul kumar
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ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला
Bashir Badr
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ख़ुश है तू गर दग़ा में सही ख़ुश रहे मैं भी तो चाहता हूँ यही ख़ुश रहे
Dinesh Sen Shubh
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यहाँ कोई नहीं मरता किसी के दूर जाने से किसी के दूर जाने से यहाँ कोई नहीं मरता
Dinesh Sen Shubh
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मैं अमानत हुआ था कितनों की बा'द में कह दिया पिया तुम ने
Dinesh Sen Shubh
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राधिका से भी कृष्ण बिछड़े थे तुम को लगता है तुम अकेले हो
Dinesh Sen Shubh
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हमें तो उस के काँधों का सहारा बस सहारा है पिता है वो हमारा इस जहाँ में सब से प्यारा है
Dinesh Sen Shubh
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