जो लिखा दीवारों पे था नाम तेरा मिट रहा है तू भी या'नी मेरे दिल से रफ़्ता-रफ़्ता मिट रहा है रेत पे लिक्खा हुआ वो नाम मिट जाता है जैसे वैसे ही तो मेरे दिल से तेरा चेहरा मिट रहा है
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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
Shabeena Adeeb
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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ये तू किस दुश्मनी की दिल में कसक लाया है ज़ख़्म भरने के लिए यार नमक लाया है
Rovej sheikh
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तुम को हम से उलझन कौन हो तुम इश्क़ के जानी दुश्मन कौन हो तुम जिस को दिया था कंगन तुम वो नहीं लौटा रही हो कंगन कौन हो तुम
Rovej sheikh
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माथे से उस की आँख तक पहुँचा ही था घबरा के उस ने कह दिया अब यार बस
Rovej sheikh
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तसव्वुर था उसे ख़ुद की मुकम्मल सी ग़ज़ल कहता नदामत है कि वो दुल्हन किसी की बन चुकी होगी
Rovej sheikh
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लगा के ज़ख़्म पर जानाँ नमक हँसकर ग़ज़ल कहना बहुत होता है मुुश्किल फिर सनम तुझ पर ग़ज़ल कहना सजी होती है इक महफ़िल पुराने यार होते हैं वही पीना पिलाना और ज़ियादा-तर ग़ज़ल कहना
Rovej sheikh
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