कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ कि चमक चमक के पलट गए न लहू मिरे ही जिगर में था न तुम्हारी ज़ुल्फ़ सियाह थी
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ईद का चाँद तुम ने देख लिया चाँद की ईद हो गई होगी
Idris Azad
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उस ने खिड़की से चाँद देखा था मैं ने खिड़की में चाँद देखा है
Zubair Ali Tabish
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उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा
Iftikhar Naseem
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चाँद ने ओढ़ ली है चादर-ए-अब्र अब वो कपड़े बदल रही होगी
Jaun Elia
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ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा
Munawwar Rana
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ज़ीस्त में मेरे उस ने अँधेरा किया और उस को सभी 'रौशनी' कहते थे
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ज़रा तुम अपनी हद में रहने की कोशिश करो वरना तुम्हारे ऐब से इक दिन तुम्हें बदनाम कर देंगे
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ये हवाओं की संगत का फल था कि अब आइने में नहीं दिखता मेरा बदन
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तुम क्या जानो यार अदीबों की हस्ती हम मरने के बा'द भी ज़िंदा रहते हैं
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तुम पढ़ना क़ुरआन के हर इक हर्फ़ को यूँँ अपनी इन मीठी मीठी आवाज़ों से
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