khudara ek nigah-e-naz hi se dekh lo hum ko gareban phadne ko aaj hum tayyar baithe hain
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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ज़िंदगी भर यूँँ मेरे दिल को दुखाया था बहुत क़ब्र पर आया है वो मुझ से मुआ'फ़ी के लिए
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ज़िंदगी भर मैं बोलूँगा तुझ को इश्क़ का यूँँ दग़ाबाज़ है तू
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वो दर्द भला क्या समझेंगे जो दर्द हमेशा देते हैं
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याद करूँँगा इतनी शिद्दत से रब को मैं मेरी इबादत से तेरा चेहरा निखरेगा
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वो मुंसिफ़ है मेरा जो क़ातिल है जाँ का मेरे हक़ में वो फ़ैसला क्या करेगा
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