खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें
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हुस्न बला का क़ातिल हो पर आख़िर को बेचारा है इश्क़ तो वो क़ातिल जिस ने अपनों को भी मारा है ये धोखे देता आया है दिल को भी दुनिया को भी इस के छल ने खार किया है सहरा में लैला को भी
Jaun Elia
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कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
Mirza Ghalib
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करती है तो करने दे हवाओं को शरारत मौसम का तकाज़ा है कि बालों को खुला छोड़
Abrar Kashif
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बाज़ार जा के ख़ुद का कभी दाम पूछना तुम जैसे हर दुकान में सामान हैं बहुत आवाज़ बर्तनों की घर में दबी रहे बाहर जो सुनने वाले हैं, शैतान हैं बहुत
Aalok Shrivastav
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बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी हम निहत्थों पे उस ने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं उस ने आँखें अगर बंद कर ली तो बाँहें खुले छोड़ दी
Khurram Afaq
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वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँँ नहीं करता वो बद-गुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे
Qateel Shifai
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सितम तो ये है कि वो भी न बन सका अपना क़ुबूल हम ने किए जिस के ग़म ख़ुशी की तरह कभी न सोचा था हम ने 'क़तील' उस के लिए करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह
Qateel Shifai
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तेज़ धूप में आई ऐसी लहर सर्दी की मोम का हर इक पुतला बच गया पिघलने से
Qateel Shifai
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राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ
Qateel Shifai
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जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ जाने क्यूँँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं
Qateel Shifai
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